Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१६८ ][ छ ढाळा
पोषते) पुष्ट नहि करतां मात्र (तप) तपनी (बढावन हेतु) वृद्धि
करवाना हेतुथी [आहारना] (छ्यालीश) छेंतालीस (दोष विना)
दोषने टाळीने (अशनको) भोजनने (लैं) ग्रहण करे छे.
*
(शुचि) पवित्रताना (उपकरण) साधन [कमंडलने] (ज्ञान)
ज्ञानना (उपकरण) साधन [शास्त्रने] अने (संयम) संयमना
(उपकरण) साधन [पींछीने] (लखिकैं) जोईने (गहैं) ग्रहण करे
छे [अने] (लखिकैं) जोईने (धरैं) राखे छे; [अने] (मूत्र)
पेशाब (श्लेषम) लींट वगेरे (तन-मल) शरीरना मेलने
(निर्जन्तु) जीव रहित (थान) स्थान (विलोकि) जोईने (परिहरैं)
त्यागे छे.
भावार्थवीतरागी जैन मुनि-साधु उत्तम कुळवाळा
श्रावकना घरे, आहारना छेंतालीस दोषोने टाळी अने अमुक
रसो छोडीने (अथवा स्वादनो राग नहि करतां), शरीरने पुष्ट
करवानो अभिप्राय नहि राखतां, मात्र तपनी वृद्धि करवा माटे
आहार ले छे, तेथी तेओने त्रीजी एषणा समिति होय छे.
पवित्रतानुं साधन कमंडळने, ज्ञाननुं साधन शास्त्रने अने संयमनुं
साधन पींछीने
जीवोनी विराधना बचाववा अर्थे, जोई-
नोंधते आहारना दोषोनुं विशेष वर्णन ‘अनगार धर्मामृत’ अने
‘मूलाचार’ वगेरे शास्त्रोथी जाणवुं. ते दोषोने टाळवाना हेतुथी
दिगंबर साधुओने कोई कोई वखत महिनाओ सुधी भोजन न
मळे छतां पण मुनि जराय खेद करता नथी; अनासक्ति अने
निर्मोह हठ वगरना सहज होय छे. [कायर जनोने-अज्ञानीओने
आवुं मुनिव्रत दुःखमय लागे छे-ज्ञानीने सुखमय लागे छे.]