करवाना हेतुथी [आहारना] (छ्यालीश) छेंतालीस (दोष विना)
दोषने टाळीने (अशनको) भोजनने (लैं) ग्रहण करे छे.
ज्ञानना (उपकरण) साधन [शास्त्रने] अने (संयम) संयमना
(उपकरण) साधन [पींछीने] (लखिकैं) जोईने (गहैं) ग्रहण करे
छे [अने] (लखिकैं) जोईने (धरैं) राखे छे; [अने] (मूत्र)
पेशाब (श्लेषम) लींट वगेरे (तन-मल) शरीरना मेलने
(निर्जन्तु) जीव रहित (थान) स्थान (विलोकि) जोईने (परिहरैं)
त्यागे छे.
रसो छोडीने (अथवा स्वादनो राग नहि करतां), शरीरने पुष्ट
करवानो अभिप्राय नहि राखतां, मात्र तपनी वृद्धि करवा माटे
आहार ले छे, तेथी तेओने त्रीजी एषणा समिति होय छे.
पवित्रतानुं साधन कमंडळने, ज्ञाननुं साधन शास्त्रने अने संयमनुं
साधन पींछीने
दिगंबर साधुओने कोई कोई वखत महिनाओ सुधी भोजन न
मळे छतां पण मुनि जराय खेद करता नथी; अनासक्ति अने
निर्मोह हठ वगरना सहज होय छे. [कायर जनोने-अज्ञानीओने
आवुं मुनिव्रत दुःखमय लागे छे-ज्ञानीने सुखमय लागे छे.]