अज्ञानी जीव गुप्ति माने छे. हवे मनमां तो भक्ति आदिरूप
अनेक प्रकारना शुभ रागादि विकल्पो थाय छे, एटले प्रवृत्तिमां
तो गुप्तिपणुं बने नहि. (सम्यग्दर्शन-ज्ञान अने आत्मामां
लीनता वडे) वीतरागभाव थतां ज्यां मन-वचन-कायानी चेष्टा
थाय नहि ए ज साची गुप्ति छे.
नथी अने अप्रिय (प्रतिकूळ) उपर कहेलां पांच विषयोमां द्वेष
करता नथी. ए रीते पांच इन्द्रियोने जीतवाना कारणे तेओ
जितेन्द्रिय कहेवाय छे. ४.
नित करैं श्रुतिरति करैं प्रतिक्रम, तजैं तन अहमेवको;
जिनके न न्हौन, न दंतधोवन, लेश अंबर-आवरन,
भूमाहिं पिछली रयनिमें कछु शयन एकासन करन. ५.