Chha Dhala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१७० ][ छ ढाळा
अथवा चौपगा प्राणीओनुं टोळुं (खाज) पोतानी खंजवाळ-
खुजलीने (खुजावते) खंजवाळे छे. [जे] (शुभ) प्रिय अने
(असुहावने) अप्रिय [पांच इन्द्रिय संबंधी] (रस) पांच रस,
(रूप) पांच वर्ण, (गंध) बे गंध, (फरस) आठ प्रकारना स्पर्श
(अरु) अने (शब्द) शब्द (तिनमें) ते बधामां (राग-विरोध)
राग के द्वेष (न) मुनिने थतां नथी, [तेथी ते मुनि] (पंचेन्द्रिय
जयन) पांच इन्द्रियोने जीतवावाळां एटले के जितेन्द्रिय (पद
पावने) पदने पामे छे.
भावार्थआ गाथामां निश्चयगुप्तिनुं तथा भावलिंगी
मुनिना २८ मूळगुणोमां पांच इन्द्रियना जयना स्वरूपनुं वर्णन
करे छे.
भावलिंगी मुनि ज्यारे उग्र पुरुषार्थ वडे शुद्धोपयोगरूपे
परिणमी निर्विकल्पपणे स्वरूपमां गुप्त थाय छे ते निश्चयगुप्ति
छे; अने ते वखते मन-वचन-कायानी क्रिया स्वयं रोकाई जाय
छे; तेमनी शांत अने अचळ मुद्रा जोईने तेमना शरीरने पथ्थर
समजी मृगना टोळा
* (पशुओ) खुजली खंजवाळे छे, छतां ते
मुनिओ पोताना ध्यानमां निश्चल रहे छे. ते भावलिंगी मुनिने
त्रण गुप्ति छे.
*आ संबंधमां सुकुमाल मुनिनुं द्रष्टांत छेः---ज्यारे तेओ ध्यानमां
हता त्यारे एक शियाळी अने तेनां बे बच्चांओ तेमनो अर्धो पग
खाई गया पण तेओ पोताना ध्यानथी जरापण चलायमान थया
नहि. (संयोगथी दुःख थतुं ज नथी, शरीरादिमां ममता करे तो
ते ममत्वभावथी ज दुःखनो अनुभव थाय छे---एम समजवुं.)