ज्ञानावरणादि आठे कर्मनो स्वयं सर्वथा नाश थाय छे
अने गुण प्रगटता नथी, पण गुणना निर्मळ पर्यायो
प्रगट थाय छे; जेमके अनंतदर्शन-ज्ञान-सम्यक्त्व-सुख
अने अनंतवीर्य, अटल अवगाहना, अमूर्तिक
(सूक्ष्मत्व) अने अगुरुलघुत्व
भगवंतोने अनंत गुण समजवा.
अनुमोदन)थी, बे (मन, वचन) योग द्वारा, पांच
इन्द्रिय (कर्ण, चक्षु, नासिका, जीभ, स्पर्श)थी, चार
संज्ञा (आहार, भय, मैथुन, परिग्रह) सहित द्रव्यथी
अने भावथी सेवन
वचन, कायारूप) योग द्वारा, पांच (कर्ण, चक्षु, नासिका,
जीभ, स्पर्शरूप) इन्द्रियथी, चार (आहार, भय, मैथुन,
परिग्रह) संज्ञा सहित द्रव्यथी अने भावथी, सोळ
(अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यानावरणीय, प्रत्याख्याना-