Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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९२ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
पुनः स एवं विमृशति पुद्गलेन किल संयोगस्तदपेक्षा मरणादयस्तद्व्यथाः कथं
परिह्रियन्त इति पुद्गलेन देहात्मना मूर्तद्रव्येण सह किल आगमे श्रूयमाणो जीवस्य
सम्बन्धोऽस्ति तदपेक्षाश्च पुद्गलसंयोगनिमित्ते जीवस्य मरणादयो मृत्युरोगादयः सम्भवन्ति
तद्यथा मरणादयः सम्भवन्ति मरणादिसम्बन्धिन्यो बाधाः कथं ? केन भावनाप्रकारेण मया
परिह्रियन्ते तदभिभवः कथं निवार्यत इत्यर्थः स्वयमेव समाधत्ते
भावार्थ :देहादिना संबंधने लीधे संसारमां प्राणीओने अनेक दुःख भोगववां पडे
छे. माटे जीवे ते देहादि साथेनी एकताबुद्धिने सर्वथा छोडवी जोईए, अर्थात् मनवचन
कायनुं आलंबन छोडवुं जोईए अने स्वसन्मुख थई एवा परिणाम करवा जोईए, के जेथी
मन
वचनकायनुं अवलंबन छूटी आत्मा अविकारी थाय अने छेवटे आत्माना प्रदेशोनुं
परिस्पंदन पण अटकी जाय.
ज्यां सुधी शरीरमनवाणीमां आत्मबुद्धि छे, त्यां सुधी संसारनी परंपरा चालु रहे
छे, परंतु मनवचनकाय आत्माथी भिन्न छे, एवा भेदविज्ञानना अभ्यासथी मुक्तिनी
प्राप्ति थाय छे. २८.
वळी, ते आवी रीते विचारे छेः
पुद्गल (शरीरादि मूर्त द्रव्य) साथे खरेखर (जीवनो) संयोग छे. तेनी अपेक्षावाळां
मरणादि अने तेनां दुःखो केवी रीते दूर करी शकाय? पुद्गल साथे एटले शरीर साथे
मूर्तद्रव्य साथेजीवनो संबंध आगममां सांभळवामां आवे छे. तेना कारणे एटले पुद्गलना
संयोगनिमित्ते जीवने मरणादि अर्थात् मरणरोगादि संभवे छे. तेने जेम मरणादि संभवे
छे, तेम मरणादिसंबंधी बाधाओ (दुःखो) पण संभवे छे; तो केवी रीतेक्या प्रकारनी
भावनाथी मारे ते (दुःखादि) परिहरवां? अर्थात् तेनुं आक्रमण (हुमलो) केवी रीते निवारी
शकाय? एवो अर्थ छे.
स्वयं ज तेनुं समाधान करे छेः
फि र भावना करनेवाला सोचता है कि पुद्गलशरीरादिकरूपी मूर्तद्रव्यके साथ
जैसा कि आगममें सुना जाता है, जीवका सम्बन्ध है। उस सम्बन्धके कारण ही जीवका
मरण व रोगादिक होते हैं, तथा मरणादि सम्बन्धी बाधायें भी होती हैं
तब इन्हें कैसे
व किस भावनासे हटाया जावे ? वह भावना करनेवाला स्वयं ही समाधान कर लेता
है कि