कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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यतश्चैवं तत एनं संयोगं सर्वं निःशेषं त्यजामि । कैः क्रियमाणं ? मनोवाक्कायकर्मभिर्मनोवर्गणा-
द्यालम्बनैरात्मप्रदेशपरिस्पंदैस्तैरेवा त्यजामि । अयमभिप्रायो मनोवाक्कायान्प्रतिपरिस्पन्दमान
नात्मप्रदेशान् भावतो निरुद्धामि । तद्भेदाभेदाभ्यासमूलत्वात्सुखदुःखैकफलनिर्वृतिसंसृत्योः ।
तथा चोक्तं [समाधितन्त्रे ]
‘‘स्वबुद्धया यावद् गृह्णीयात्कायवाकचेतसां त्रयम् ।
संसारस्तावदेतेषां भेदाभ्यासे तु निर्वृतिः’’ ।।६२।।
संयोगने लीधे अर्थात् देहादिना संबंधने लीधे होय छे ( – अर्थात् देहादिना संबंधने लीधे
प्राणीओने अनेक दुःखो भोगववां पडे छे). तेथी ते सर्व संयोगने (तेना प्रत्येना रागने)
हुं संपूर्णपणे छोडुं छुं. शा वडे करवामां आवता (संबंधने)? मन – वचन – कायनी क्रियाथी,
मनोवर्गणादिना आलंबनथी आत्मप्रदेशोना परिस्पन्द द्वारा (करवामां आवता संबंधने) ज
हुं छोडुं छुं. आनो अभिप्राय ए छे के मन – वचन – काय प्रति (तेना आलंबनथी) परिस्पन्द
थता आत्माना प्रदेशोने हुं भावथी रोकुं छुं, कारण के सुख – दुःख जेनुं एक फळ छे तेवा
मोक्ष – संसारनुं तेवा भेदाभेदनो अभ्यास मूल छे. ( – अर्थात् आत्मा, मन – वचन – कायथी
भिन्न छे – एवा भेद – अभ्यासथी सुखरूप मोक्षनी प्राप्ति थाय छे अने आत्मा, मन –
वचन – कायथी अभिन्न छे – एवा अभेद अभ्यासथी दुःखरूप संसारनी प्राप्ति थाय छे).
तथा ‘समाधितंत्र’ — श्लोक ६२मां कह्युं छे केः —
‘ज्यां सुधी शरीर, वाणी अने मन – ए त्रणने ‘ए मारां छे’ एवी आत्मबुद्धिथी
(जीव) ग्रहण करे छे. त्यां सुधी संसार छे अने ज्यारे तेमनाथी भेद – बुद्धिनो (अर्थात्
आत्मा शरीरादिथी भिन्न छे – एवी भेदबुद्धिनो) अभ्यास करे छे, त्यारे मुक्ति थाय छे.’
मन, वचन, कायका आलम्बन लेकर चंचल होनेवाले आत्माके प्रदेशोंको भावोंसे रोकता हूँ ।
‘आत्मा मन, वचन, कायसे भिन्न है’, इस प्रकारके अभ्याससे सुखरूप एक फलवाले मोक्षकी
प्राप्ति होती है और मन, वचन, कायसे आत्मा अभिन्न है, इस प्रकारके अभ्याससे दुःखरूप
एक फलवाले संसारकी प्राप्ति होती है, जैसा पूज्यपादस्वामीने समाधिशतकमें कहा है —
‘‘स्वबुद्धया यत्तु गृह्णीयात्०’’
‘‘जब तक शरीर, वाणी और मन इन तीनोंको ये ‘स्व हैं – अपने हैं’ इस रूपमें
ग्रहण करता रहता है । तब तक संसार होता है और जब इनसे भेद-बुद्धि करनेका अभ्यास
हो जाता है, तब मुक्ति हो जाती है ।’’ ।।२८।।