९० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
पुनर्भावक एवं विमृशति संयोगात्किमिति देहादिभिः सम्बन्धाद्देहिनां किं फलं
स्यादित्यर्थः ।
तत्र स्वयमेव समाधत्ते —
दुःखसन्दोहभागित्वं संयोगादिह देहिनाम् ।
त्यजाम्येनं ततः सर्वं मनोवाक्कायकर्मभिः ।।२८।।
टीका — दुःखानां संदोहः समूहस्तद्भागित्वं देहिनामिह संसारे संयोगाद्देहादिसम्बन्धाद्भवेत् ।
स्वसंवेदनज्ञानगोचर छे. कर्मसंबंधित शरीर, स्त्री, पुत्रादि बाह्य संयोगी पदार्थो तथा विकारी
भावो आत्माना चैतन्यस्वरूपथी सर्वथा भिन्न छे. २७.
फरी भावक (भावना करनार) विचारे छे के संयोगथी शुं (फळ)? एनो अर्थ ए
छे के देहादिना संबंधथी प्राणीओने शुं फळ मळे?
ते ज समये ते स्वयं ज समाधान करे छेः —
देहीने संयोगथी, दुःख समूहनो भोग,
तेथी मन – वच – कायथी, छोडुं सहु संयोग. २८.
अन्वयार्थ : — [इह ] आ संसारमां [संयोगान् ] देहादिकना संबंधथी [देहिनां ]
प्राणीओने [दुःखसंदोहभागित्वं ] दुःखसमूह भोगववुं पडे छे (अर्थात् अनंत दुःख भोगववां
पडे छे), [ततः ] तेथी [पनं सर्वं ] ते समस्त (संबंध)ने [मनोवाक्कायकर्मभिः ] मन – वचन –
कायनी क्रियाथी [त्यजामि ] हुं तजु छुं.
टीका : — दुःखोनो संदोह (समूह) – तेनुं भोगववापणुं अहीं एटले आ संसारमां
फि र भावना करनेवाला सोचता है कि देहादिकके सम्बन्धसे प्राणियोंको क्या होता
है ? क्या फल मिलता है ? उसी समय वह स्वयं ही समाधान भी करता है कि —
प्राणी जा संयोगते, दुःख समूह लहात ।
याते मन वच काय युत, हूँ तो सर्व तजात ।।२८।।
अर्थ — इस संसारमें देहादिकके सम्बन्धसे प्राणियोंको दुःख-समूह भोगना पड़ता
है — अनन्त क्लेश भोगने पड़ते हैं, इसलिये इस समस्त सम्बन्धको जो कि मन, वचन,
कायकी क्रियासे हुआ करते हैं, मनसे, वचनसे, कायसे छोड़ता हूँ । अभिप्राय यह है कि