कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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टीका — द्रव्यार्थिकनयादेकः पूर्वापरपर्यायानुस्यूतो निर्ममो – ममेदमहमस्येत्यभिनिवेशशून्यः
शुद्धः शुद्धनयादेशाद् द्रव्यभावकर्मनिर्मुक्तो ज्ञानी स्वपरप्रकाशनस्वभावो योगीन्द्रगोचरोऽनन्त-
पर्यायविशिष्टतया केवलिनां शुद्धोपयोगमात्रमयत्वेन श्रुतकेवलिनां च संवेद्योहमात्मास्मि । ये तु
संयोगाद् द्रव्यकर्मसम्बन्धाद्याता मया सह सम्बन्धं प्राप्ता भावा देहादयस्ते सर्वेऽपि मत्तो
मत्सकाशात्सर्वथा द्रव्यादिप्रकारेण बाह्या भिन्नाः सन्ति ।
[ज्ञानी ] ज्ञानी अने [योगीन्द्रगोचरः ] योगीन्द्रो द्वारा जाणवा योग्य छुं; [संयोगजाः ]
संयोगजन्य [सर्वे अपि भावाः ] बधाय जे (देहरागादिक) भावो छे ते [मत्तः ] माराथी
[सर्वथा ] सर्वथा [बाह्याः ] भिन्न छे.
टीका : — द्रव्यार्थिकनयथी एक एटले पूर्वापर पर्यायोमां अनुस्यूत (अन्वित),
निर्मम एटले ‘आ मारुं छे,’ ‘हुं एनो छुं’ एवा अभिनिवेश (मिथ्या मान्यता)थी रहित,
शुद्ध एटले शुद्धनयनी अपेक्षाए द्रव्यकर्म – भावकर्मथी रहित, ज्ञानी एटले स्व – परप्रकाशक
स्वभाववाळो अने योगीन्द्रगोचर एटले केवलीओने अनंत पर्यायोनी विशिष्टता सहित
जाणवा योग्य (ज्ञेय) तथा श्रुतकेवलीओने शुद्धोपयोगमात्रपणाने लीधे संवेदनयोग्य हुं
आत्मा छुं.
संयोगथी एटले द्रव्यकर्मना संबंधथी जे देहादिक भावोनो (पदार्थोनो) मारी साथे
संबंध प्राप्त थयो छे, ते बधा माराथी सर्वथा द्रव्यादि प्रकारे (द्रव्य-क्षेत्र – काल – भावे) बाह्य
एटले भिन्न छे.
भावार्थ : — द्रव्यस्वभावे आत्मा एक छे, आत्मा निर्मम छे अर्थात् ‘आ मारुं छे’
अने ‘हुं एनो छुं’ – एवा अभिनिवेशथी (मिथ्या अभिप्रायथी) शून्य छे; आत्मा शुद्ध छे
अर्थात् द्रव्यकर्म – भावकर्मथी रहित छे, ते ज्ञानी एटले स्व – पर प्रकाशक स्वभाववाळो छे
अने जेम ते केवली अने श्रुतकेवलीने ज्ञानगोचर छे; तेम सर्व सम्यग्द्रष्टिओने पण ते
संयोगजन्य जितने भी देहादिक पदार्थ हैं, वे मुझसे सर्वथा बाहिरी-भिन्न हैं ।
विशदार्थ — मैं द्रव्यार्थिकनयसे एक हूँ, पूर्वापर पर्यायोंमें अन्वित हूँ । निर्मम हूँ –
‘मेरा यह’ ‘मैं इसका’ ऐसे अभिनिवेशसे रहित हूँ । शुद्ध हूँ, शुद्धनयकी अपेक्षासे, द्रव्यकर्म
भावकर्मसे रहित हूँ, केवलियोंके द्वारा तो अनन्त पर्याय सहित रूपसे और श्रुतकेवलियोंके
द्वारा शुद्धोपयोगमात्ररूपसे जाननेमें आ सकने लायक हूँ, ऐसा मैं आत्मा हूँ, और जो
संयोगसे-द्रव्यकर्मोंके सम्बन्धसे प्राप्त हुए देहादिक पर्याय हैं, वे सभी मुझसे हर तरहसे
(द्रव्यसे, गुणसे, पर्यायसे) बिल्कुल जुदे हैं ।।२७।।