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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अथाह शिष्यः । कथं नु तदिति । निर्ममत्वविचिंतनोपायप्रश्नोऽयं ।
अथ गुरुस्तत्प्रक्रियां मम विज्ञस्य का स्पृहेति यावदुपदिशति —
एकोऽहं निर्ममः शुद्धो ज्ञानी योगीन्द्रगोचरः ।“
बाह्यः संयोगजा भावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ।।२७।।
‘पर द्रव्य मारुं नथी’ एवुं परिणमन ज्यारे थाय छे, त्यारे ते परम उदासीनतारूप
परिणमे छे अने तेनुं फळ त्रण लोकना जीवो जेने पोतानो स्वामी माने तेवुं पद ते प्राप्त
करे छे.
ज्यारे पर भावथी रहित थई मुक्त थाय, त्यारे नथी प्रवृत्ति के नथी निवृत्ति, केवल
शुद्धस्वरूप ज छे. २६.
हवे शिष्य कहे छे — ते (निर्ममत्व) केवी रीते होय? ‘निर्ममत्वनुं चिंतवन करवाना
उपायनो’ आ प्रश्न छे.
हवे गुरु तेनी (उपायनी) प्रक्रियाने ‘एकोऽहं.......श्लोक २७थी लई ‘मम विज्ञस्य
का स्पृहा’ — श्लोक ३० सुधीना श्लोको द्वारा उपदेशे छे.
निर्मम एक विशुद्ध हुं, ज्ञानी योगी – गम्य,
संयोगी भावो बधा, मुजथी बाह्य अरम्य. २७.
अन्वयार्थ : — [अहं ] हुं [एकः ] एक, [निर्ममः ] ममतारहित, [शुद्धः ] शुद्ध
यहाँ पर शिष्य कहता है कि इसमें निर्ममता कैसे होवे ? इसमें निर्ममताके चिंतवन
करनेके उपायोंका सवाल किया गया है । अब आचार्य उसकी प्रक्रियाको ‘‘एकोऽहं निर्ममः०’’
से प्रारम्भ कर ‘‘मम विज्ञस्य का स्पृहा०’’ तकके श्लोकों द्वारा बतलाते हैं ।
मैं इक निर्मम शुद्ध हूँ, ज्ञानी योगीगम्य ।
कर्मोदयसे भाव सब, मोते पूर्ण अगम्य ।।२७।।
अर्थ — मैं एक, ममता रहित, शुद्ध, ज्ञानी, योगीन्द्रोंके द्वारा जानने लायक हूँ ।
*एगो भे सस्सदो आदा णाणदंसणलक्खणो ।
सेसा मे बाहिरा भावा सव्वे संयोगलक्खणा ।।
[श्री नियमसार गाथा – १०२]