Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ८७
इत्यादि श्रुतज्ञानभावनया मुमुक्षुर्विशेषेण भावयेत्
उक्तं च[आत्मानुशासने ]
‘निवृत्तिं भावयेद्यावन्ननिर्वृत्तिस्तदभावतः
न वृत्तिर्न निवृत्तिश्च तदेव पदमव्ययम्’ ।।२३६।।
‘‘शरीरादिक मुझसे भिन्न हैं, मैं भी परमार्थसे इनसे भिन्न हूँ, न में इनका कुछ
हूँ, न मेरे ही ये कुछ हैं ’’ इत्यादिक श्रुतज्ञानकी भावनासे मुमुक्षुको भावना करनी चाहिए
आत्मानुशासनमें गुणभद्रस्वामीने कहा है ‘‘निवृत्तिं भावयेत्’’
जब तक मुक्ति नहीं हुई तब तक परद्रव्योंसे हटनेकी भावना करे जब उसका
अभाव हो जाएगा, तब प्रवृत्ति ही न रहेगी बस वही अविनाशी पद जानो ।।२६।।
श्री गुणभद्राचार्ये ‘आत्मानुशासन’श्लोक २३६मां कह्युं छे केः
‘ज्यां सुधी मुक्ति न थाय त्यां सुधी (परभावोथी) निवृत्तिनी (पाछा हठवानी)
भावना करवी. तेना (परभावना) अभावमां प्रवृत्ति अने निवृत्ति ज रहेशे नहि. ते ज
अविनाशी पद छे.’
भावार्थ :ज्यारे स्त्रीपुत्रादि मारां अने हुं तेमनोएवा ममकाररूप विभाव
परिणामोथी जीव परिणमे छे, त्यारे रागद्वेषरूप परिणतिना निमित्ते शुभाशुभ कर्मनो बंध
थाय छे, किन्तु ज्यारे स्त्री, पुत्रादि पदार्थोमां मारापणानी कल्पना छोडी दे छे’, त्यारे निर्मम
परिणामोथी शुभाशुभ कर्मनो बंध थतो नथी. माटे निर्ममत्वनुं ज चिंतवन करवुं जोईए.
जे समये उपयोग विभाव भावोथी एकरूप थाय छे. ते समये रागद्वेष साथे
एकताबुद्धिथी परिणामरूप अध्यवसानभावथी बंध थाय छे. रागादिथी एकतारूप उपयोग
ज कर्मबंधनुं कारण छे, परंतु रागादिथी एकतारहित उपयोग बंधनुं कारण नथी
ते
कर्मथीमुक्तिनुं कारण छे.
जे परने पर अने आत्माने आत्मा मानी रागीद्वेषी थतो नथी अने पर पदार्थोमां
सुखदुःखनी कल्पना करतो नथी, परंतु ते प्रत्ये समभावी रहे छे. ते कर्मोथी छूटे छे अने
परमात्मा बने छे.
‘रागी कर्मथी बंधाय छे अने विरागी कर्मथी छूटे छे’ एवो जिनेन्द्र भगवाननो
बंधमोक्षनो संक्षेपमां उपदेश छे.