Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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८६ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
‘अकिञ्चनोऽहमित्यास्व त्रैलोक्याधिपतिर्भवेः
योगिगम्यं तव प्रोक्तं रहस्यं परमात्मनः ।।’’ [आत्मानुशासने ]
अथवा‘‘रागी बध्नाति कर्माणि वीतरागो विमुञ्चति
जीवो जिनोपदेशोऽयं संक्षेपाद्वन्धमोक्षयोः ।।’’ [ज्ञानार्णवे ]
यस्मादेवं तस्मात्सर्वप्रयत्नेन व्रताद्यवधानेन मनोवाक्कायप्रणिधानेन वा निर्ममत्वं
विचिन्तयेत्
मत्तः कायादयोऽभिन्नास्तेभ्योऽहमपि तत्त्वतः
नाहमेषां किमप्यस्मि ममाप्येते न किञ्चन ।। [तत्त्वानुशासन१५८ ]
मैं अकिंचन हूँ, मेरा कुछ भी नहीं, बस ऐसे होकर बैठे रहो और तीन लोकके
स्वामी हो जाओ यह तुम्हें बड़े योगियोंके द्वारा जाने जा सकने लायक परमात्माका रहस्य
बतला दिया है
और भी कहा है‘‘रागी बध्नाति कर्माणि०’’ रागी जीव कर्मोंको बाँधता है
रागादिसे रहित हुआ जीव मुक्त हो जाता है बस यही संक्षेपमें बंध मोक्ष विषयक जिनेन्द्रका
उपदेश है जब कि ऐसा है, तब हरएक प्रयत्नसे व्रतादिकोंमें चित्त लगाकर अथवा मन,
वचन, कायकी सावधानतासे निर्ममताका ही ख्याल रखना चाहिए ‘‘मत्तः कायादयो
भिन्नास्
’’
‘आत्मानुशासन’श्लोक ११०मां कह्युं छे केः
‘हुं अकिंचन छुं (एटले मारुं कांई पण नथी)एम भावना करी बेसी रहो
(परिणमो) अने त्रण लोकना स्वामी बनी जाओ. आ तने योगीओने गम्य (जाणी शकाय
तेवुं)
एवुं परमात्मानुं रहस्य बताव्युं छे;
अथवा ज्ञानार्णवपृ. २४२मां कह्युं छे केः
‘रागी (जीव) कर्मो बांधे छे अने वीतरागी जीव (रागादिथी रहित जीव) कर्मोथी
मुक्त थाय छे. बंधमोक्ष संबंधी जिनेन्द्रनो आ संक्षेपमां उपदेश छे.’
तेथी सर्व प्रयत्नथी व्रतादिमां (शुद्ध परिणमनमां) अवधानथी (चित्त लगावी)
अथवा मन, वचन, कायनी सावधानीथी निर्ममत्वनुं विशेष प्रकारे चिंतवन करवुं जोईए.
‘माराथी शरीरादि भिन्न छे अने परमार्थे तेमनाथी हुं पण भिन्न छुं. हुं तेमनो कांई
पण नथी अने तेओ पण मारा कांईपण नथी,’
इत्यादि श्रुतज्ञाननी भावनाथी मुम़ुक्षुए (खास करीने) भाववुं जोईए.