Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ८५
तथा चोक्तम्
‘न कर्मबहुलं जगन्नचलनात्मकं कर्म वा,
न चापि करणानि वा न चिदचिद्वधो बन्धकृत्
यदैक्यमुपयोगभूःसमुपयाति रागादिभिः
स एव किल केवलं भवति बन्धसेतुर्नृणाम् ।।
तथा स एव जीवो निर्ममस्तद्विपरीतस्तैर्मुच्यत इति यथासंख्येन योजनार्थं
क्रमादित्युपात्तम्
उक्तं च
भी कर्मोंसे बँधता है उपलक्षणसे यह भी अर्थ लगा लेना कि ‘मैं इसका हूँ’ ऐसे
अभिनिवेशवाला जीव भी बँधता है, जैसा कि अमृतचंद्राचार्यने समयसार कलशमें कहा है
‘‘न कर्म बहुलं जगन्न’’
अर्थन तो कर्मस्कन्धोंसे भरा हुआ यह जगत् बंधका कारण है, और न हलन-
चलनादिरूप क्रिया ही, न इन्द्रियाँ कारण हैं और न चेतन-अचेतन पदार्थोंका विनाश करना
ही बन्धका कारण है
किन्तु जो उपयोगस्वरूपी जमीन रागादिकोंके साथ एकताको प्राप्त
होती है, सिफ र् वही अर्थात् जीवोंका रागादिक सहित उपयोग ही बन्धका कारण है यदि
वही जीव निर्ममरागादि रहित-उपयोगवाला हो जाय, तो कर्मोंसे छूट जाता है कहा भी
है कि‘‘अकिंचनोऽह’’
श्री अमृतचन्द्राचार्ये श्री समयसार कलश श्लोक १६४मां कह्युं छे केः
‘कर्मबंध करनारुं कारण, नथी बहु कर्मयोग्य पुद्गलोथी भरेलो लोक, नथी चलनरूप
कर्म (अर्थात् कायवचनमननी क्रियारूप योग), नथी अनेक प्रकारनां करणो (इन्द्रियो)
के नथी चेतनअचेतननो घात. ‘उपयोग भू’ अर्थात् आत्मा रागादिक साथे जे ऐक्य पामे
छे ते ज एक (मात्र रागादिक साथे एकपणुं पामवुं ते ज) खरेखर पुरुषोने बंधनुं कारण
छे.’
तथा ते ज जीव जो निर्मम एटले तेनाथी विपरीत (अर्थात् रागादिथी रहित
उपयोगवाळो) थाय, तो ते कर्मोथी छूटी जाय छे.
(अनुक्रम संख्यानी योजना माटे श्लोकमां ‘क्रमात्’ शब्द वापर्यो छे, (जेम के
सममः, वध्यते, निर्ममः मुच्यते).