Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 26.

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८४ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
गुरुराह
बध्यते मुच्यते जीवः सममो निर्ममः क्रमात्
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन निर्ममत्वं विचिन्तयेत् ।।२६।।
टीकाममेत्यव्ययं ममेदमित्यभिनिवेशार्थमव्ययानामनेकार्थत्वात् तेन सममो
ममेदमित्यभिनिवेशाविष्टो अहमस्येत्यभिनिवेशाविष्टश्चोपलक्षणत्वात् जीवः कर्मभिर्बध्यते
आचार्य कहते हैं
मोही बाँधत कर्मको, निर्मोही छुट जाय
यातें गाढ़ प्रयत्नसे, निर्ममता उपजाय ।।२६।।
अर्थ‘‘ममतावाला जीव बँधता है और ममता रहित जीव मुक्त होता है इसलिए
हर तरहसे पूरी कोशिशके साथ निर्ममताका ही ख्याल रक्खे ’’
विशदार्थअव्ययोंके अनेक अर्थ होते हैं, इसलिए, ‘‘मम’’ इस अव्ययका अर्थ
अभिनिवेश’ है, इसलिए ‘समम’ कहिए ‘मेरा यह है’ इस प्रकारके अभिनिवेशवाला जीव
गुरु कहे छेः
मोही बांधे कर्मने, निर्मम जीव मुकाय,
तेथी सघळा यत्नथी, निर्मम भाव जगाय. २६.
अन्वयार्थ :[सममः जीवः ] ममतावाळो जीव अने [निर्ममः जीवः ] ममतारहित
जीव [क्रमात् ] अनुक्रमे [बध्यते ] बंधाय छे अने [मुच्यते ] मुक्त थाय छे (बंधनथी छूटे
छे); [तस्मात् ] तेथी [सर्वप्रयत्नेन ] पूरा प्रयत्नथी [निर्ममत्वं ] निर्ममत्वनुं [विचिन्तयेत् ] विशेष
करीने चिंतवन करवुं जोईए.
टीका :अव्ययोना अनेक अर्थ होय छे, ‘मम’ ए अव्यय छे. तेनो अर्थ
अभिनिवेश थाय छे, तेथी ‘सममः’ अर्थात् ‘मम इदम्’ ‘आ मारुं छे’ एवा अभिनिवेशवाळो
(जीव) तथा उपलक्षणथी ‘अहम् अस्यं’हुं आनो छुंएवा अभिनिवेशवाळो जीव
कर्मोथी बंधाय छे.
परदब्बरओ वज्झदि विरओ मुच्चेइ विविह - कम्मेहिं
एसो जिणउवदेसो समासदो बन्ध - मुक्खस्स ।।२३।।
[मोक्षप्राभृत ]