Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ८३
अत्राह शिष्य :तर्हि कथं बन्धस्तत्प्रतिपक्षश्च मोक्ष इति भगवन् !
यद्यात्मकर्मद्रव्ययोरध्यात्मयोगेन विश्लेषः क्रियते तर्हि कथं केनोपायप्रकारेण तर्योबन्धः
परस्परप्रदेशानुप्रवेशलक्षणः संश्लेषः स्यात्
तत्पूर्वकत्वाद्विश्लेषस्य कथं च तत्प्रतिपक्षो
बन्धविरोधीमोक्षः सकलकर्मविश्लेषलक्षणो जीवस्य स्यात्तस्यैवानन्तसुखहेतुत्वेन योगिभिः
प्रार्थनीयत्वात्
यहाँ पर शिष्यका कहना है कि भगवन् ! यदि आत्मद्रव्य और कर्मद्रव्यका
अध्यात्मयोगके बलसे बन्ध न होना बतलाया जाता है, तो फि र किस प्रकारसे उन दोनोंमें
(आत्मा और कर्मरूप पुद्गल द्रव्योंमें) परस्पर एकके प्रदेशोंमें दूसरेके प्रदेशोंका मिल जाना
रूप बंध होगा ? क्योंकि बन्धाभाव तो बंधपूर्वक ही होगा
और बंधका प्रतिपक्षी, संपूर्ण
कर्मोंकी विमुक्तावस्थारूप मोक्ष भी जीवको कैसे बन सकेगा ? जो कि अविच्छिन्न अविनाशी
सुखका कारण होनेसे योगियोंके द्वारा प्रार्थनीय हुआ करता है ?
कोई पर द्रव्यना संबंधनो अभाव होवाथी संयोगादिरूप कोई नवो संबंध घटतो नथी,
परंतु ते अवस्थामां कर्मादिनो जे जूनो संयोग संबंध छे, तेनो पण निर्जरा द्वारा अभाव
थाय छे.
श्लोक-२४मां कह्युं छे के ‘अध्यात्मयोगथी कर्मोनी शीघ्र निर्जरा थाय छे’ए कथन
पूर्वबद्ध कर्मोनी अपेक्षाए छे. ज्यारे आत्मानुं परमात्मा साथे एकीकरण थाय छे, त्यारे
आत्मा ज चिन्मात्र थई जाय छे, तो पछी आत्मानो द्रव्यकर्मो साथे संबंध ज केवी रीते
बने? उत्कृष्ट अद्वैत ध्यानावस्थामां नवा कर्मनो कोई पण प्रकारनो संबंध नथी, तो छूटवुं
कोनुं (निर्जरा कोनी)? तेथी सिद्धयोगी या गतयोगी अथवा अयोगकेवली ने कर्मोनी निर्जरा
कही छे ते पूर्वबद्ध कर्मोनी थाय छे, एम समजवुं. तेमने कर्मोनी निर्जरा थाय छे
ए कहेवुं
ए व्यवहारनयथी छे, निश्चयनयथी नहि. २५
अहीं शिष्य कहे छेत्यारे बंध अने तेनो प्रतिपक्षरूप मोक्ष केवी रीते? भगवान्!
जो अध्यात्मयोगथी आत्मद्रव्य अने द्रव्यकर्मनो विश्लेष (एक बीजाथी भिन्न) करवामां
आवे, तो केवी रीते एटले कया प्रकारना उपाय वडे, ते बंनेनो बंध
अर्थात् परस्पर
प्रदेशानुप्रवेशलक्षण संश्लेष (संयोगरूप बंध) होय? कारण के ते पूर्वक (बंधपूर्वक) ज
विश्लेष (वियोग) होय; अने तेनो प्रतिपक्षी एटले बन्धविरोधी मोक्ष जे संपूर्ण कर्मोना
विश्लेष (अभाव) लक्षणवाळो छे ते जीवने केवी रीते होई शके? कारण के अनंतसुखनुं
कारण होवाथी योगीओ द्वारा ते प्रार्थनीय छे.