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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
‘ध्यायते येन तद्धयानं यो ध्यायति स एव वा ।
यत्र वा ध्यायते यद्वा ध्यातिर्वा ध्यानमिष्यते’ ।।६७।।
ध्यायत इति ध्येयं वा ध्यातिक्रिययाऽऽध्याप्यं । यदा यस्मिन्नात्मनः परमात्मना
सहैकीकरणकाले आत्मैव चिन्मात्रमेव स्यात्तदा कीदृशः संयोगादिप्रकारः सम्बन्धो द्रव्यकर्मणा
सहात्मनः स्यात् येन जायतेध्यात्मयोगेन कर्मणामाशु निर्जरेति परमार्थतः कथ्यते ।
जिसके द्वारा ध्यान किया जाय अर्थात् जो ध्यान करनेमें करण हो – साधन हो, उसे ध्यान
कहते हैं । तथा जो ध्याता है — ध्यानका कर्ता है, उसे भी ध्यान कहते हैं, जैसा कि कहा
भी है — ‘‘ध्यायते येन तद् ध्यानं०’’
‘‘जो ध्यैञ् चिन्तायाम्’’ धातुका व्याप्य हो अर्थात् जो ध्याया जावे, उसे ध्येय कहते
है । परंतु जब आत्माका परमात्माके साथ +एकीकरण होनेके समय, आत्मा ही चिन्मात्र हो
जाता है, तब संयोगादिक प्रकारोंमेंसे द्रव्यकर्मोंके साथ आत्माका कौनसे प्रकारका सम्बन्ध
होगा ? जिससे कि ‘‘अध्यात्मयोगसे कर्मोंकी शीघ्र निर्जरा हो जाती है’’ यह बात परमार्थसे
कही जावे । भावार्थ यह है कि आत्मासे कर्मोंका सम्बन्ध छूट जाना निर्जरा कहलाती है ।
परंतु जब उत्कृष्ट अद्वैत ध्यानावस्थामें किसी भी प्रकार कर्मका सम्बन्ध नहीं, तब छूटना
किसका ? इसलिए सिद्धयोगी कहो या गतयोगी अथवा अयोगी केवली कहो, उनमें कर्मोंकी
निर्जरा होती है, यह कहना व्यवहारनयसे ही है, परमार्थसे नहीं ।’’ ।।२५।।
‘जे द्वारा ध्यान करवामां आवे छे ते ध्यान अथवा जे ध्यान ध्यावे छे ते ज ध्यान
छे, अथवा जे ध्याववामां आवे छे ते अथवा ध्यातिने ध्यान कहे छे.’
जे ध्याववामां आवे ते ध्येय छे अथवा ध्यातिक्रियाथी ध्येय समजवुं. ज्यारे
आत्माना, परमात्मा साथे एकीकरणना काळे आत्मा ज चिन्मात्र ज थई जाय, त्यारे
द्रव्यकर्म साथे आत्मानो संयोगादि – रूप केवा प्रकारनो संबंध होई शके; जेथी
‘अध्यात्मयोगथी कर्मोनी शीघ्र निर्जरा थई जाय छे’ — ए संबंधी (श्लोक २४मां) परमार्थे
कहेवामां आव्युं छे?
भावार्थ : — चटाई अने चटाईनो कर्ता — बंने एकबीजाथी भिन्न – भिन्न छे, तेथी
ते बंनेनो संयोग संबंध बनी शके छे, परंतु ध्यान अने ध्येयरूप अवस्था आत्माथी अभिन्न
होवाथी तेनो आत्मा साथे तादात्म्य संबंध छे, संयोग संबंध नथी.
जे समये आत्मा ध्यान अवस्थामां परमात्मरूपनी साथे एकमेक थई जाय छे, ते
समये ध्यान अने ध्येयमां अभिन्नता रहे छे. ते समये चैतन्यरूप आत्मपिंड सिवाय अन्य