Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ८१
टीकास्याद् भवेत् कोसौ ? सम्बन्धः द्रव्यादिना प्रत्यासत्तिः कयोः ? द्वयोः
कथंचिद्भिन्नयोः पदार्थयोः इति अनेन लोकप्रसिद्धेन प्रकारेण कथमिति यथाहमस्मि कीदृशः
कर्त्ता निर्माता कस्य ? कटस्य वंशदलानां जलादिप्रतिबन्धाद्यर्थस्य परिणामस्य एवं सम्बन्धस्य
द्विष्ठतां प्रदर्श्य प्रकृतेर्व्यतिरेकमाह ध्यानमित्यादि ध्यायते येन ध्यायति वा यस्तद्धयानं
ध्यातिक्रियां प्रति करणं कर्ता वा
उक्तं च; [तत्त्वानुशासने ]
हुआ करता है जहाँ आत्मा ही ध्यान, ध्याता (ध्यान करनेवाला) और ध्येय हो जाता है,
वहाँ सम्बन्ध कैसा ?
विशदार्थलोकप्रसिद्ध तरीका तो यही है, कि किसी तरह भिन्न (जुदाजुदा)
दो पदार्थोंमें सम्बन्ध हुआ करता है जैसे बाँसकी खपच्चियोंसे जलादिकके सम्बन्धसे
बननेवाली चटाईका मैं कर्ता हूँबनानेवाला हूँ यहाँ बनानेवाला ‘मैं’ जुदा हूँ और
बननेवाली ‘चटाई’ जुदी है तभी उनमें ‘कर्तृकर्म’ नामक सम्बन्ध हुआ करता है इस
प्रकार सम्बन्ध द्विष्ठ (दो में रहनेवाला) हुआ करता है इसको बतलाकर, प्रकृतमें (ध्यानमें)
वह बात (भिन्नता) बिलकुल भी नहीं है, इसको दिखलाते हैं
‘‘ध्यायते येन, ध्यायति वा यस्तद् ध्यानं, ध्यातिक्रियां प्रति करणं कर्त्ता च’’
द्वयोः ] जुदा जुदा बे पदार्थो वच्चे [सम्बन्धः ] संबंध [स्यात् ] होई शके. [यदा ] ज्यारे
[आत्मा एव ] आत्मा ज [ध्यानं ध्येयं ] ध्यान अने ध्येयरूप थई जाय [तदा ] त्यारे [कीदृशः
सम्बन्धः ] संबंध केवो?
टीका :होई शके. कोण ते? संबंध अर्थात् द्रव्यादि साथे प्रत्यासत्ति (निकट
संयोग). कया बंनेनो (संबंध)? आ लोकप्रसिद्ध प्रकार वडे कथंचित् बंने भिन्न पदार्थोनो.
केवी रीते? जेम के ‘हुं छुं.’ केवो (हुं)? कर्ता एटले निर्माता (करनार). कोनो (कर्त्ता)
चटाईनो
अर्थात् वांसनी चीपोना जलादिना संबंधथी उत्पन्न थता पदार्थना
परिणामनोएवी रीते संबंधनुं द्विष्ठपणुं (एटले बंनेमां रहेवावाळा संबंधने) बतावीने
प्रकृतिनी भिन्नता कही (अनादिथी आत्मा अने कर्मनो संयोग संबंध छे, परंतु संबंध बंने
भिन्न पदार्थो वच्चे होई शके, तेथी प्रकृति (कर्म) आत्माथी भिन्न पदार्थ छे एम कह्युं ).
ध्यान इत्यादिजे द्वारा ध्याववामां आवे अर्थात् जे ध्यावे ते ध्यान छे अथवा
ध्यातिक्रियामां जे करण (साधन) होय वा कर्ता होय तेने (सर्वेने) ध्यान कहे छे.
‘तत्त्वानुशासन’श्लोक ६७मां कह्युं छे केः