Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 25.

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८० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
श्रूयतां चास्यैवार्थस्य संग्रहश्लोकः
कटस्य कर्त्ताहमिति सम्बधः स्याद् द्वयोर्द्वयोः
ध्यानं ध्येयं यदात्मैव सम्बन्धः कीदृशस्तदा ।।२५।।
उपरिलिखित अर्थको बतलानेवाला और भी श्लोक सुनो
‘कटका मैं कर्तार हूँ’ यह है द्विष्ठ सम्बन्ध
आप हि ध्याता ध्येय जहँ, कै से भिन्न सम्बन्ध ।।२५।।
अर्थ‘‘मैं चटाईका बनानेवाला हूँ’’ इस तरह जुदाजुदा दो पदार्थोंमें सम्बन्ध
साथे अबुद्धिपूर्वक शुभ भाव होय छे; तेमने शुद्धोपयोगना कारणे घातिकर्मनी निर्जरा थाय
छे अने अबुद्धिपूर्वकना शुभ भावने लीधे तेमने घातिकर्मनो तथा अघातिनी शुभकर्मप्रकृतिनो
गुणस्थान अनुसार बंध थाय छे.
वीतरागता प्राप्त थया पछी योगथी मात्र सातावेदनीय कर्मनो आस्रव थाय छे.
१४मा गुणस्थानमां तेमने कर्मोनो संवर परिपूर्ण थाय छे तथा सर्व कर्मोनी निर्जरा १४मा
गुणस्थानने अंते थाय छे. आ प्रमाणे सिद्धयोगीनी दशा होय छे.
(२) साध्ययोगीमुख्यपणे सातमा गुणस्थानवर्ती मुनि साध्ययोगी कहेवाय छे.
ज्यारे तेओ निर्विकल्प स्वरूपमां लीन थाय छे त्यारे जेटला अंशे वीतरागता होय छे तेटला
अंशे घातिकर्मनो बंध थतो नथी, परंतु त्यां अबुद्धिपूर्वक शुभभाव होवाथी तेटला अंशे
घातिकर्मनो तेमज सातावेदनीयादि शुभकर्मनो बंध थाय छे, परंतु असातावेदनीयादि
अशुभकर्मनो बंध थतो नथी.
चोथा पांचमा गुणस्थाने पण धर्मी जीव कोई कोई वखते निर्विकल्प ध्यानमां होय
छे अने त्यारे तेने कर्मोना संवरबंधनी व्यवस्था उपर प्रमाणे होय छे. मुख्यपणे ४
६ गुणस्थानोमां सविकल्प दशा होय छे.
आ ज अर्थने बतावनार संग्रहश्लोक सांभळः
‘चटाईनो करनार हुं’, ए बेनो संयोग,
स्वयं ध्यानने ध्येय ज्यां, केवो त्यां संयोग? २५.
अन्वयार्थ :[अहं ] हुं [कटस्य ] चटाईनो [कर्त्ता ] कर्ता छुं [इति ] ए रीते [द्वयोः