कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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‘सीलेसिं संपत्तो णिरुद्धणिस्सेसआसवो जीवो ।
कम्मरयबिप्पमुक्को गयजोगो केवली होदि ।।’
गुणस्थानवाले जीवों) में भी उत्कृष्ट शुक्लेश्याके संस्कारके वशसे उतनी देर (पंच ह्रस्व
अक्षर बोलनेमें जितना समय लगता है, उतने समय) तक कर्मपरतन्त्रताका व्यवहार होता
है, जैसा कि परमागम(गोम्मटसार-जीवकांड) में कहा गया है — ‘‘सीलेसिं संपत्तो०’’
‘‘जो शीलोंके ईशत्व (स्वामित्व) को प्राप्त हो गया है, जिसके समस्त आस्रव रुक
गये हैं, तथा जो कर्मरूपी धूलीसे रहित हो गया है, वह गतयोग-अयोगकेवली होता
है’’ ।।२४।।
पण उत्कृष्ट शुक्ललेश्याना संस्कारना आवेशवश तेटला समय सुधी (पांच ह्नस्व स्वर
बोलवामां जेटलो समय लागे त्यां सुधी) कर्म परतन्त्रतानो व्यवहार होय छे; तथा
परमागममां – गोम्मटसार जीवकांडमां कह्युं छे केः —
‘जेओ शीलोना (अढार हजार शीलोना) भेदोना इशत्वने (स्वामित्वने) प्राप्त थया
छे, जेमने समस्त आस्रव रोकाई गयो छे तथा जे कर्मरूपी रजथी रहित थई गया छे;
ते गतयोग (अयोग) केवली छे.’
भावार्थ : — अध्यात्मयोगथी आत्मामां आत्मानुं ज जोडाण (ध्यान) करवाथी कर्मोनी
निर्जरा थाय छे.
ते ध्यान करनार जीवोना बे प्रकार छेः —
(१) सिद्धयोगी अर्थात् जे ते भवे ज मुक्ति पामे छे अने (२) अचरमशरीरी
ध्यानाभ्यासी योगी अर्थात् साध्ययोगी — जेओ ते भवे मुक्ति पामता नथी ते —
(१) सिद्धयोगी क्षपकश्रेणी मांडी ते ज भवे मोक्ष पामे छे.
आठमा गुणस्थानेथी१
ते श्रेणी शरू थाय छे. दशमा गुणस्थान सुधी तेमने शुद्धोपयोग
१. ‘मोह अने योगना निमित्तथी सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान अने सम्यक्चारित्ररूप आत्माना गुणोनी
तारतम्यरूप अवस्थाविशेषने गुणस्थान कहे छे. तेना चौद भेद छेः —
१. मिथ्यात्व, २. सासादन, ३. मिश्र, ४. अविरतसम्यग्द्रष्टि, ५. देशविरत, ६. प्रमतविरत,
७. अप्रमत्तविरत, ८. अपूर्वकरण, ९. अनिवृतिकरण, १०. सूक्ष्मसंपराय, ११. उपशान्तमोह,
१२. क्षीणमोह, १३. सयोगी केवली अने १४. अयोगी केवली.
(श्री जैन सिद्धान्त प्रवेशिका — ५९१, ५९२.)