Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 78 of 146
PDF/HTML Page 92 of 160

 

background image
७८ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
कथमपि सम्भवतीत्यर्थः यदा खल्वात्मैव ध्यानं ध्येयं च स्यात्तदा सर्वात्मनाप्यात्मनः परद्रव्याद्
व्यावृत्य स्वरूपमात्रावस्थितत्वात्कथं द्रव्यान्तरेण सम्बन्धः स्यात्तस्य द्विष्ठत्वात् न चैतत्संसारिणो
न संभवतीति वाच्यं संसारतीरप्राप्तस्य योगिनो मुक्तात्मवत्पञ्चह्स्वाक्षरोच्चारणकालं
यावत्तथावस्थानसम्भवात् कर्मक्षपणाभिमुखस्य लक्षणोत्कृष्टशुक्ललेश्यासंस्कारावेशवशात्तावन्मात्र-
कर्मपारतन्त्रव्यवहरणात्
तथाचोक्तम् परमागमे
विचार करो कि उस समय जब कि योगी पुरुष स्वरूपमात्रमें अवस्थान कर रहा है, उस
समय द्रव्यकर्मका आत्माके साथ संयोगादि सम्बन्धोंमेंसे कौनसा सम्बन्ध हो सकता है ?
मतलब यह है कि किसी तरहका सम्बन्ध नहीं बन सकता
जिस समय आत्मा ही ध्यान
और ध्येय हो जाता है, उस समय हर तरहसे आत्मा परद्रव्योंसे व्यावृत होकर केवलस्वरूपमें
ही स्थित हो जाता है
तब उसका दूसरे द्रव्यसे सम्बन्ध कैसा ? क्योंकि सम्बन्ध तो दोमें
रहा करता है, एकमें नहीं होता है
यह भी नहीं कहना कि इस तरहकी अवस्था संसारी-जीवमें नहीं पाई जाती कारण
कि संसाररूपी समुद्र-तटके निकटवर्ती अयोगीजनोंका मुक्तात्माओंकी तरह पंच ह्रस्व अक्षर
(अ, इ, उ, ऋ, लृ) के बोलनेमें जितना काल लगता है, उतने काल तक वैसा (निर्बन्ध-
बन्ध रहित) रहना सम्भव है
शीघ्र ही जिनके समस्त कर्मोंका नाश होनेवाला है, ऐसे जीवों (चौदहवें
आत्मा साथे संबंध (प्रत्यासत्ति) केवी रीते कया संयोगादि प्रकारे संभवे छे ते जरा
सूक्ष्मद्रष्टिथी विचार कर; अर्थात् कोई रीते (संबंध) संभवतो नथी, एवो अर्थ छे.
ज्यारे खरेखर आत्मा ज ध्यान अने ध्येय थई जाय छे त्यारे सर्व रीते आत्मा
पर द्रव्योथी व्यावृत्त थई, स्वरूपमात्रमां अवस्थित थवाथी बीजा द्रव्य साथे तेनो संबंध
केवी रीते होय? कारण के संबंध तो बे (द्रव्यो) वच्चे होय (एकमां न होय) आवी
(अवस्था) संसारी जीवने संभवती नथी, एम नहि (अर्थात् संभवे छे) एवुं वाच्य छे,
कारण के संसारना कांठाने प्राप्त थयेला अयोगीने, मुक्तात्मानी माफक पांच ह्नस्व
[अ, इ,
उ, ऋ लृ ] बोलवामां जेटलो काळ लागे तेटला काळ सुधी तेवी (निर्बन्ध) अवस्था रहेवी
संभवित छे.
जेमनां समस्त कर्मो शीघ्र नाश थवानां छे, एवा (चौदमा गुणस्थानवर्ती) जीवने