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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
ज्वरादिविकारात् मम व्यथा स्यात्तथा बालाद्यवस्थो नाहमस्मि, ततः कथं बालाद्यवस्थाप्रभवैः
दुखैरभिभूयेय अहमिति सामर्थ्यादत्र दृष्टव्यम् । तर्हि क्व मृत्युप्रभृतीनी स्युरित्याह — एतानि
मृत्युव्याधिबालादीनि पुद्गले मूर्त्ते देहादावेव सम्भवन्ति । मूर्तधर्मत्वादमूर्ते मयि तेषां
नितरामसम्भवात् ।
ज्वरादि विकारोथी मने व्यथा (पीडा) केम होय? तथा हुं बालादि अवस्थावाळो नथी. तेथी
बालादि अवस्थाओथी उत्पन्न थतां दुःखोथी हुं केवी रीते घेराउं? (केवी रीते दुःखी थाउं?)
एम सामर्थ्यथी अहीं समजवुं.
पूछे छे — त्यारे मृत्यु वगेरे शामां होय छे? ए मृत्यु, व्याधि, बालादि
(अवस्थाओ) पुद्गलमां एटले मूर्त शरीरादिमां ज संभवे छे. कारण के तेओ मूर्त पदार्थोना
धर्मो होवाथी, अमूर्त एवा मारामां तेमनो बिलकुल संभव नथी.
भावार्थ : — जे जीवने पोताना चिदानंद स्वरूपनो निश्चय थई गयो छे, तेने
(सम्यग्द्रष्टिने) द्रव्यप्राणना त्यागरूप मरणनो भय होतो नथी, कारण के ते निःशंक छे के
शरीरनो (पर्यायद्रष्टिए) नाश थाय छे. परंतु चित्शक्तिलक्षणात्मक ज्ञानदर्शनरूप भावप्राणनो
कदी पण नाश थतो नथी. तेने मरणनो भय नथी, तो मरणना कारणभूत कृष्ण सर्पादिनो
क्यांथी भय होय? न ज होय.
वळी, तेने वात – पित्त – कफनी विषमताथी (असमानताथी) उत्पन्न थता व्याधिओनो
पण डर होतो नथी. कारण के ते जाणे छे के तेमनो संबंध मूर्त पदार्थो (शरीरादि) साथे
छे. आत्मा साथे नथी; तेथी ज्वरादिनी पीडा तेने केम होय? न ज होय.
वळी बाल, वृद्धादि अवस्थाओ पुद्गलनी छे. आत्मानी नथी; तेथी ते अवस्थाओथी
उत्पन्न थतां दुःखोनुं वेदन पण तेने केम होय? न ज होय.
मृत्यु, व्याधि तथा बाल वृद्धादि अवस्थाओ पुद्गल – मूर्त शरीरादिमां ज होई शके
छे. कारण के ते बधा मूर्तिमान पुद्गलना धर्मो छे. जीव तो अमूर्तिक चेतन छे. तेमां ते
धर्मो कदापि पण होई शके नहि. २९.
है, तब ज्वर आदि विकारोंसे मुझे व्यथा तकलीफ कैसी ? उसी तरह मैं बाल – वृद्ध आदि
अवस्थावाला भी नहीं हूँ । तब बाल – वृद्ध आदि अवस्थाओंसे पैदा होनेवाले दुःखों-क्लेशोंसे
मैं कैसे दुःखी हो सकता हूँ ? अच्छा यदि मृत्यु वगैरह आत्मामें नहीं होते, तो किसमें
होते हैं ? इसका जवाब यह है कि ‘एतानि पुद्गले’ ये मृत्यु-व्याधि और बाल-वृद्ध आदि
दशाएँ पुद्गल-मूर्त शरीर आदिकोंमें ही हो सकती हैं । कारण कि ये सब मूर्तिमान पदार्थोंके
धर्म हैं । मैं तो अमूर्त हूँ, मुझमें वे कदापि नहीं हो सकतीं ।