कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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भूयोऽपि भावक एव स्वयमाशङ्कते — तर्ह्येतान्यासाद्य मुक्तानि पश्चात्तापकारीणि
भविष्यन्तीति यद्युक्तनीत्या भयादयो मे न भवेयुस्तर्हि एतानि देहादिवस्तुन्यासाद्य
जन्मप्रभृत्यात्मीयभावेन प्रतिपद्य मुक्तानीदानीं भेदभावनावष्टम्भान्मया त्यक्तानि ।
चिराभ्यस्ताभेदसंस्कारवशात्पश्चात्तापकारीणि किमितींमानि मयात्मीयानि त्यक्तानीत्यनुशयकारीणि
मम भविष्यन्ति ।
भुक्तोज्झिता मुहुर्मोहान्मया सर्वेऽपिपुद्गलाः ।
उच्छिष्टेष्विव तेष्वद्य मम विज्ञस्य का स्पृहा ।।३०।।
फरीथी भावक (भावना करनार) ज स्वयं आशंका करे छे. त्यारे प्राप्त करीने छोडी
दीधेली ते (शरीरादि वस्तुओ) पश्चात्तापकारी बनशे; अर्थात् जो उक्त नीति अनुसार मने
भयादि न होय, तो ए देहादि वस्तुओने प्राप्त करीने – एटले जन्मथी मांडीने तेमने
आत्मीय भावे स्वीकारीने – हवे में छोडी दीधी अर्थात् भेदभावनाना बळथी में त्यजी दीधी;
तो ते देहादि वस्तुओ, चिरकालना अभ्यस्त अभेद (एकत्वबुद्धिना अभ्यासना) संस्कारने
लीधे शुं पश्चात्तापकारी बनशे? अर्थात् पोतानी मानी लीधेली ते वस्तुओने में छोडी दीधी,
तेथी शुं ते (वस्तुओ) मने पश्चात्तापजनक थई पडशे?
अहीं भावक स्वयं ज प्रतिषेधनो विचार करी कहे छे —
‘ना, एम बनी शकशे नहि,’ कारण केः —
मोहे भोगवी पुद्गलो, कर्यो, सर्वनो त्याग,
मुज ज्ञानीने क्यां हवे, ए एंठोमां राग? ३०.
फि र भी भावना करनेवाला खुद शंका करता है, कि यदि कही हुई नीतिके अनुसार
मुझे भय आदि न होवे न सही, परन्तु जो जन्मसे लगाकर अपनाई गई थी और भले
ही जिन्हें मैंने भेद-भावनाके बलसे छोड़ दिया है; ऐसी देहादिक वस्तुएँ चिरकालके अभ्यस्त-
अभेद संस्कारके वशसे पश्चात्ताप करनेवाली हो सकती हैं, कि ‘अपनी इन चीजोंको मैंने
क्यों छोड़ दिया ?’
भावक-भावना करनेवाला स्वयं ही प्रतिबोध हो सोचता है कि नहीं, ऐसा हो सकता
है, कारण कि —
सब पुद्गलको मोहसे, भोग भोगकर त्याग ।
मैं ज्ञानी करता नहीं, उस उच्छिष्टमें राग ।।३०।।