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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अत्र स्वयमेव प्रतिषेधमनुध्यायति तन्नेति यतः —
टीका — मोहादविद्यावेशवशादनादिकालं कर्मादिभावेनोपादाय सर्वे पुद्गलाः मया
संसारिणा जीवेन वारंवारं पूर्वमनुभूताः पश्चाच्च नीरसीकृत्य त्यक्ताः यतश्चैवं तत् उच्छिष्टेष्विव
भोजनगन्धमाल्यादिषु स्वयं भुक्त्वा त्यक्तेषु यथा लोकस्य तथा मे सम्प्रति विज्ञस्य
तत्त्वज्ञानपरिणतस्य तेषु फे लाकल्पेषु पुद्गलेषु का स्पृहा ? न कदाचिदपि । वत्स ! त्वया
मोक्षार्थिना निर्ममत्वं विचिन्तनीयम् ।
अन्वयार्थ : — [मोहात् ] मोहथी [सर्वे अपि ] बधाय [पुद्गलाः ] पुद्गलो [मुहुः ]
वारंवार [मया भुक्तोज्झिताः ] में भोगव्यां अने छोडी दीधां. [उच्छिष्टेषु इव तेषु ] उच्छिष्ट
(एंठा) जेवा ते पदार्थोमां [अद्य ] हवे [मम विज्ञस्य ] मारा जेवा भेदज्ञानीने [का स्पृहा ]
शी स्पृहा (चाहना) होय? (अर्थात् ए भोगोनी मने हवे इच्छा नथी).
टीका : — मोहथी अर्थात् अविद्याना आवेशवश अनादिकालथी में – संसारी जीवे
सर्व पुद्गलोने कर्मादिभावे ग्रहण करीने वारंवार पहेलां भोगव्यां अने पछी तेमने नीरस
करीने छोडी दीधां. जो एम छे तो स्वयं भोगवीने छोडी दीधेला उच्छिष्ट (एंठा) जेवां
भोजन, गंध, मालादिमां – जेम लोकने भोगवीने छोडी दीधेला (पदार्थोमां) स्पृहा (इच्छा)
होती नथी, – तेम हवे तत्त्वज्ञानथी परिणत विज्ञ (ज्ञानी) एवा मने ते उच्छिष्ट (भोगवीने
छोडी दीधेलां) जेवा पुद्गलोमां शी स्पृहा होय? कदापि न होय, वत्स! तुं मोक्षार्थी छे
तो तारे निर्ममत्वनी भावना विशेष करवी जोईए. (एम स्वयंने संबोधे छे.)
अर्थ — मोहसे मैंने समस्त ही पुद्गलोंको बार – बार भोगा और छोड़ा । भोग – भोगकर
छोड़ दिया । अब जूठनके लिए (मानिन्द) उन पदार्थोंमें मेरी क्या चाहना हो सकती है ?
अर्थात् उन भोगोंके प्रति मेरी चाहना-इच्छा ही नहीं है ।
विशदार्थ — अविद्याके आवेशके वशसे अनादिकालसे ही मुझ संसारीजीवको कर्म
आदिके रूपमें समस्त पुद्गलोंको बार – बार पहिले भोगा, और पीछा उन्हें नीरस (कर्मत्वादि
रहित) कर – करके छोड़ दिया । जब ऐसा है, तब स्वयं भोगकर छोड़ दिये गये जूँठन-
उच्छिष्ट भोजन, गन्ध, मालादिकोंमें जैसे लोगोंको फि र भोगनेकी स्पृहा नहीं होती, उसी
तरह इस समय तत्त्वज्ञानसे विशिष्ट हुए मेरी उन छिनकी हुई रेंट (नाक) सरीखे पुद्गलोंमें
क्या अभिलाषा हो सकती है ? नहीं नहीं, हरगिज नहीं । भैया ! जब की तुम मोक्षार्थी हो
तब तुम्हें निर्ममत्वकी ही भावना करनी चाहिए (एसा स्वयंको संबोधन क रते हैं) ।।३०।।