कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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अत्राह शिष्यः । अथ कथं ते निबध्यन्त इति । अथेति प्रश्ने केन प्रकारेण पुद्गला
जीवेन नियतमुपादीयन्त इत्यर्थः ।
गुरुराह —
कर्म कर्महिताबन्धि जीवोजीवहितस्पृहः ।
स्व - स्वप्रभावभूयस्त्वे स्वार्थं को वा न वाञ्छति ।।३१।।
भावार्थ : — ज्ञानी विचारे छे के जेम कोई भोजनादि पदार्थोने स्वयं भोगवीने छोडी
दे अने छोडी दीधेला उच्छिष्ट (एंठा) पदार्थोने फरीथी भोगववा इच्छे नहि, तेम अविद्याना
संस्कारवशे अनादिकाळथी अनेकवार भोगवीने छोडी दीधेला पदार्थोने हवे — ज्ञानी
थयाथी — हुं भोगववा इच्छतो नथी अर्थात् ते भोगो प्रति हवे तेने स्पृहा ज थती नथी.
अहीं आचार्ये ‘सर्व पुद्गलोने में वारंवार भोगव्यां अने छोडी दीधां’ — एम ज
कह्युं छे ते व्यवहारनयनुं कथन छे, कारण के जे परद्रव्य छे ते ग्रही शकातुं नथी तथा छोडी
शकातुं नथी. एवो ज कोई तेनो (आत्मानो) प्रायोगिक (परनिमित्तथी थएलो) तेम ज
वैस्रसिक (स्वाभाविक) गुण छे.’* ३०.
अहीं शिष्य कहे छे के — ‘ते पुद्गलो केवी रीते बंधाय छे? एटले के जीव द्वारा
पुद्गलो शा माटे अने क्या प्रकारे हंमेशा बंधने प्राप्त थतां रहे छे?
गुरु कहे छेः —
कर्म कर्मनुं हित चहे, जीव जीवनो स्वार्थ,
स्व प्रभावनी वृद्धिमां, कोण न चाहे स्वार्थ. ३१.
यहाँ पर शिष्य कहता है कि वे पुद्गल क्यों बँध जाते हैं ? अर्थात् जीवके द्वारा
पुद्गल क्यों और किस प्रकारसे हमेशा बन्धको प्राप्त होते रहते हैं ?
आचार्य उत्तर देते हुए कहते हैं : —
कर्म कर्महितकार है, जीव जीवहितकार ।
निज प्रभाव बल देखकर, को न स्वार्थ करतार ।।३१।।
*जे द्रव्य छे पर तेहने न ग्रही न छोडी शकाय छे,
एवो ज तेनो गुण को प्रायोगी ने वैस्रसिक छे.
(श्री समयसार गु. आवृत्ति गाथा ४०६)