Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ९९
जीवकृतं परिणामं निमित्तमात्रं प्रपद्य पुनरन्ये
स्वयमेव परिणमन्तेऽत्र पुद्गलाः कर्मभावेन ।।१२।।
परिणममानस्य चिदश्चिदात्मकैः स्वयमपि स्वकैर्भावैः
भवति हि निमित्तमात्रं पौद्गलिकं कर्म तस्यापि ।।१३।।
तथा जीवः कालादिलब्ध्या बलवानात्मा जीवस्य स्वस्यैव हितमनन्तसुखहेतुत्वेनोपकारकं
मोक्षमाकाङ्क्षति अत्र दृष्टान्तमाहस्वस्वेत्यादि निजनिजमाहात्म्यबहुतरत्वे सति स्वार्थं
*‘जीवकृत परिणामने निमित्तमात्ररूप पामीने (जीवथी भिन्न) अन्य पुद्गलो स्वयं
ज कर्मरूप परिणमे छे.’ १२.
निश्चयथी पोताना चेतनात्मक परिणामोथी स्वयं ज परिणमता जीवने पण ते
पौद्गलिक कर्म निमित्तमात्र थाय छे.’ १३.
तथा कालादि लब्धिथी बलवान थयेलो आत्मा, जीवने पोताने ज हितरूप तथा
अनंतसुखना कारणपणाने लीधे उपकारक एवा मोक्षनी आकांक्षा करे छे.
अहीं द्रष्टान्त कहे छे‘स्वस्वेत्यादि०’
पोतपोतानुं माहात्म्य अधिकतर वधतां, पोताना स्वार्थने अर्थात् पोताने उपकारक
वस्तुने कोण न इच्छे? अर्थात् सर्वे इच्छे छेएवो अर्थ छे.
‘‘जीवकृतं परिणामं’’ ‘‘परिणममानस्य’’
जीवके द्वारा किये गये परिणाम जो कि निमित्तमात्र हैं, प्राप्त करके जीवसे विभिन्न
पुद्गल खुद ब खुद कर्मरूप परिणम जाते हैं और अपने चेतनात्मक परिणामोंसे स्वयं ही
परिणमनेवाले जीवके लिए वह पौद्गलिककर्म सिफ र् निमित्त बन जाता है तथा कालादि
लब्धिसे बलवान हुआ जीव अपने हितको अनन्त सुखका कारण होनेसे उपकार करनेवाले
स्वात्मोपलब्धिरूप मोक्षको चाहता है
यहाँ पर एक स्वभावोक्ति कही जाती है कि ‘‘अपने
*जीवपरिणामहेदुं कम्मत्तं पुग्गला परिणमंति
पुग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो परिणमइ ।।८०।।
णवि कुव्वइ कम्मगुणे जीवो कम्मं तहेव जीव गुणे
अण्णोण्णणिमित्तेण दु परिणामं जाण दोह्णंपि ।।८१।।
[समयसारे कुन्दकुन्दाचार्यः ]