Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१०० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
स्वस्योपकारकं वस्तु को न वाञ्छति, सर्वोप्यभिलषतीत्यर्थः ततो विद्धि कर्माविष्टो जीवः
कर्मसञ्चिनोतीति
तेथी जाण के कर्माविष्ट (कर्मथी बंधायेलो) जीव कर्मोनो संचय करे छे (नवां कर्म
ग्रहण करे छे).
भावार्थ :आ जीवने अनादि काळथी कर्म साथे संबंध छे. पूर्वसंचित कर्मना
उदयकाळे जीव जो पोतानुं आत्मस्वरूप भूली कर्मना उदयमां जोडाय अर्थात् तेमां आत्मबुद्धि
करे तो जूनां कर्म
नवा कर्मना आस्रवमां निमित्त थाय छे. ज्यारे जीव कर्मोदयमां जोडाय
छे. त्यारे कर्मनी बळजोरी छे एम कहेवाय छे, पण ज्यारे जीव कर्मविपाकने एकताबुद्धिए
भोगवतो नथी, त्यारे जूनां कर्मनो उदय नवा कर्म
बंधमां निमित्त थतो नथी. ते समये एम
कहेवाय के जीवना बळवान पुरुषार्थ आगळ कर्मनुं कांई चालतुं नथी.
कर्म तो जड छे. तेने तो सुखदुःख नहि होवाथी हितअहित होतुं नथी, पण
जीवना हीनाधिक पुरुषार्थनी अपेक्षाए ते बळवान के बळहीन कहेवाय छे. जीवना वर्तमान
पुरुषार्थ उपर ज कर्मना बळनुं माप व्यवहारे अंकाय छे. कर्मनो ज्यारे संचय थाय छे त्यारे
कर्म पोतानुं हित इच्छे छे, एम कहेवाय छे. ते जड होवाथी तेने चाहना के इच्छा होती
नथी. कर्म कर्मनुं हित इच्छे छे एटले कर्माविष्ट जीव कर्मनो संचय करे छे
एवो टीकाकारनो
कहेवानो भाव छे.
ज्यारे आ जीव स्वस्वरूपनुं भान करी, परथी हठी स्वसन्मुख तरफनो पुरुषार्थ
जेम जेम वधारतो जाय छे, तेम तेम तेनुं (जीवन) बळ वधतुं जाय छे अने कर्मनुं
निमित्तपणुं तूटतुं जाय छे. ए समये जीवनी सबळता थई अने कर्मनी निर्बळता थई; एम
कहेवामां आवे छे.
+
ज्यारे जीव स्वस्वरूपथी च्युत थई पर तरफनुंकर्म, निमित्तादि तरफवलण करी
परनी साथे एकताबुद्धिरूप ऊंधो पुरुषार्थ करे छे, त्यारे ते कर्मने स्वयं वश थई जाय छे.
ए समये जीवनी निर्बळता छे अने कर्मनी ते काळे सबळता छे, एम कहेवामां आवे छे.
अपने माहात्म्यके प्रभावके बढ़ने पर स्वार्थको अपनी-अपनी उपकारक वस्तुको कौन नहीं
चाहता ? सभी चाहते हैं
।।३१।।
+चेतन जो निज भानमां, कर्ता आप स्वभाव,
वर्ते नहि निजभानमां, कर्ता कर्म प्रभाव.....७८
[श्रीमद् राजचन्द्र कृत‘आत्मसिद्धि’.......७८]