कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १०१
यतश्चैवं ततः —
परोपकृतिमुत्सृज्य स्वोपकारपरो भव ।
उपकुर्वन्परस्याज्ञो दृश्यमानस्य लोकवत् ।।३२।।
परनी साथे एकताबुद्धि आदि थतां जीवने राग-द्वेषादि थाय छे. आ राग – द्वेषादिना
निमित्ते कर्मबंध स्वयं थाय छे. ए रीते कर्मनी संतति चालु राखवामां जीव स्वयं ज अपराधी
छे; कर्म के निमित्तोनो तेमां कांई दोष नथी. कर्मनुं सबळपणुं के निर्बळपणुं कहेवुं ते
व्यवहारनयनुं कथन छे.
‘अज्ञानीजीवना परिणामने निमित्त करीने पुद्गलो कर्मपणे परिणमे छे अने
पुद्गलकर्मने निमित्त करीने अज्ञानीजीव पण परिणमे छे. एम जीवना परिणामने अने
पुद्गलना परिणामने परस्पर मात्र निमित्त – नैमित्तिकभाव छे, पण परस्पर कर्ता – कर्मभाव
नथी.’ ३१.(जुओ श्री समयसार गा. ८०, ८१, ८२नी टीका)
एम छे तेथीः —
द्रश्यमान देहादिनो, मूढ करे उपकार,
त्यागी पर उपकारने, कर निजनो उपकार. ३२.
अन्वयार्थ : — [अज्ञः लोकवत् ] तुं लोक समान मूढ थई [दृश्यमानस्य परस्य ]
देखवामां आवता (शरीरादि) पर पदार्थनो [उपकुर्वन् ] उपकार करे छे. (हवे) तुं [परोपकृतिं ]
परना उपकारनी इच्छा [उत्सृज्य ] छोडी दई [स्वोपकारपरः भव ] पोताना उपकारमां तत्पर
था.
इसलिये समझो कि कर्मोंसे बँधा हुआ प्राणी कर्मोंका संचय किया करता है । जब
कि ऐसा है तब —
प्रगट अन्य देहादिका, मूढ़ करत उपकार ।
सज्जनवत् या भूल को, तज कर निज उपकार ।।३२।।
अर्थ — परके उपकार करनेको छोड़कर अपने उपकार करनेमें तत्पर हो जाओ ।
इन्द्रियोंके द्वारा दिखाई देते हुए शरीरादिकोंका उपकार करते हुए तुम अज्ञ (वास्तविक
वस्तुस्थितिको न जाननेवाले) हो रहे हो । तुम्हें चाहिये कि दुनियाँकी तरह तुम भी अपनी
भलाई करनेमें लगो ।