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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
टीका : — अविद्याना वशे परना एटले कर्मना अथवा शरीरादिकना करवामां
आवता उपकारनो, विद्याना (सम्यक्ज्ञानना) अभ्यासथी त्याग करी, तुं प्रधानपणे पोतानो
(आत्मानो) अनुग्रह (उपकार) करवामां तत्पर था. शुं करतो (तुं)? उपकार करतो. कोनो?
परनो अर्थात् सर्वथा पोतानाथी बाह्य (भिन्न) देखाता तथा इन्द्रियो द्वारा अनुभवमां
आवता शरीरादिनो (उपकार करतो); कारण के (तुं) केवो छे? तुं अज्ञानी – तत्त्वोनो अजाण
छे. कोनी माफक? लोकोनी माफक. जेम (अज्ञानी) लोक ज्यां सुधी परने पररूप नथी
जाणतो, त्यां सुधी तेनो उपकार करे छे, परंतु तेने तत्त्वथी जाण्या पछी (अर्थात् स्वने
स्व – रूप अने परने पररूप जाण्या पछी) तेनो उपकार करवो छोडी दे छे अने पोतानो
उपकार करवा तत्पर थाय छे, तेम तुं पण तत्पर था (अर्थात् तत्त्वज्ञानी बनी आत्मोपकार
करवा तुं तत्पर था) — एवो अर्थ छे.
भावार्थ : — अज्ञानने लीधे अज्ञानी जीव ज्यां सुधी कर्म तथा शरीरादिने पररूप
नथी जाणतो, त्यां सुधी ते तेनुं भलुं करवानी — तेना उपर उपकार करवानी वृत्ति करे छे,
परंतु ज्यारे तेने भेदविज्ञानना बळे स्व – परनी भिन्नता भासे छे अर्थात् ते स्वने स्व –
रूप अने परने पररूप जाणे छे, त्यारे तेने पर उपर उपकार करवानो भाव छूटी जाय
टीका — परस्य कर्मणो देहादेर्वा अविद्यावशात् क्रियमाणमुपकारं विद्याभ्यासेन
त्यक्त्वात्मानुग्रहप्रधानो भव त्वं । किं कुर्वन्सन् ? उपकुर्वन् ! कस्य, परस्य सर्वथा स्वस्माद्वाह्यस्य
दृश्यमानस्येन्द्रियैरनुभूयमानस्य देहादेः । किं विशिष्टो यतस्त्वं ? अज्ञस्तत्त्वानभिज्ञः ।
किंवल्लोकवत् । यथा लोकः परं परत्वेनाजानंस्तस्योपकुर्वन्नपि तं तत्त्वेन ज्ञात्वा तदुपकारं त्यक्त्वा
स्वोपकारपरो भवत्येवं त्वमपि भवेत्यर्थः ।।३२।।
विशदार्थ — पर कहिये कर्म अथवा शरीरादिक, इनका अविद्या-अज्ञान अथवा
मोहके वशसे जो उपकार किया जाता रहा है, उसे विद्या सम्यग्ज्ञान अथवा वीतरागताके
अभ्याससे छोड़कर प्रधानतासे अपने (आत्माके) उपकार करनेमें तत्पर हो जाओ । तुम
सर्वथा अपने (आत्मा)से बाह्य इन्द्रियोंके द्वारा अनुभवमें आनेवाले इन शरीरादिकोंकी रक्षा
करना आदि रूप उपकार करनेमें लगे हुए हो । इसलिए मालूम पड़ता है कि तुम अज्ञ
(वस्तुओंके वास्तविक स्वरूपसे अजान) हो । सो जैसे दुनियाके लोग जब तक दूसरेको
दूसरे रूपमें नहीं जानते, तब तक उनका उपकार करते हैं । परन्तु ज्यों ही वे अपनेको
अपना और दूसरेको दूसरा जानते हैं, उनका (दूसरोंका) उपकार करना छोड़कर अपना
उपकार करनेमें लग जाते हैं । इसी प्रकार तुम भी तत्त्वज्ञानी बनकर अपनेको स्वाधीन
शुद्ध बनाने रूप आत्मोपकार करनेमें तत्पर हो जाओ ।।३२।।