Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 33.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १०३
छे अने ते स्वसन्मुख थई पोताना आत्मा उपर उपकार करवा उद्यमशील बने छे.
श्री पूज्यपादाचार्ये ‘समाधितंत्र’ श्लोक ३१मां कह्युं छे केः
‘आ शरीर जड छे. ते सुख-दुःखने कांई जाणतुं नथी, छतां मूढबुद्धिबहिरात्मा
तेनामां निग्रहअनुग्रहबुद्धि (अपकारउपकारबुद्धि) करे छे.
आ जीव, वस्तुस्वरूपथी अजाण होवाथी पोताना आत्माथी सर्वथा भिन्न शरीरादिनुं
कांई करी शकतो नथी, तोपण अज्ञानथी तेनी रक्षा करवा आदिरूप उपकार करवाना विकल्पमां
लाग्यो रहे छे; माटे आचार्यनो तेने उपदेश छे के, ‘अविद्यानो त्याग करी तत्त्वज्ञानी बन अने
उपकार करवानो विकल्प छोडी शुद्धात्मा बनवारूप आत्मोपकार कर.’
अहीं, शिष्य कहे छेकई रीते ते बंने वच्चेनो भेद जणाय? अर्थात् कया उपायथी
स्वपरनो भेद जणाय? ते भेद जाणनारने शुं (लाभ) थाय? एवो अर्थ छे.
आचार्य कहे छेः
गुरुउपदेश, अभ्यास ने, संवेदनथी जेह,
जाणे निजपर भेदने, वेदे शिवसुख तेह. ३३.
अथाह शिष्यः, कथं तयोर्विशेष इति केनोपायेन स्वपरयोर्भेदो विज्ञायेत तद्धि ज्ञातुश्च
किं स्यादित्यर्थः
गुरुराह
गुरुपदेशादभ्यासात्संवित्तेः स्वपरान्तरम्
जानति यः स जानाति मोक्षसौख्यं निरन्तरम् ।।३३।।
यहाँ पर शिष्य कहता है कि किस उपायसे अपने और परमें विशेषता (भेद) जानी
जाती है, और उसके जाननेवालेको क्या होगा ? किस फलकी प्राप्ति होगी ? आचार्य कहते
हैं
गुरु उपदेश अभ्याससे निज अनुभवसे भेद
निज पर को जो अनुभवे, लहै स्वसुख वेखेद ।।३३।।
न जानन्ति शरीराणिं सुखदुःखान्यबुद्धयः
निग्रहानुग्रहघियं तथाप्यत्रैव कुर्वते ।।६१।।
[समाधितन्त्र, श्री पूज्यपादाचार्यः ]