कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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छे अने ते स्वसन्मुख थई पोताना आत्मा उपर उपकार करवा उद्यमशील बने छे.
श्री पूज्यपादाचार्ये ‘समाधितंत्र’ श्लोक ३१मां कह्युं छे केः —
‘आ शरीर जड छे. ते सुख-दुःखने कांई जाणतुं नथी, छतां मूढबुद्धि – बहिरात्मा
तेनामां निग्रह – अनुग्रहबुद्धि (अपकार – उपकारबुद्धि) करे छे.१
आ जीव, वस्तुस्वरूपथी अजाण होवाथी पोताना आत्माथी सर्वथा भिन्न शरीरादिनुं
कांई करी शकतो नथी, तोपण अज्ञानथी तेनी रक्षा करवा आदिरूप उपकार करवाना विकल्पमां
लाग्यो रहे छे; माटे आचार्यनो तेने उपदेश छे के, ‘अविद्यानो त्याग करी तत्त्वज्ञानी बन अने
उपकार करवानो विकल्प छोडी शुद्धात्मा बनवारूप आत्मोपकार कर.’
अहीं, शिष्य कहे छे — कई रीते ते बंने वच्चेनो भेद जणाय? अर्थात् कया उपायथी
स्व – परनो भेद जणाय? ते भेद जाणनारने शुं (लाभ) थाय? एवो अर्थ छे.
आचार्य कहे छेः —
गुरु – उपदेश, अभ्यास ने, संवेदनथी जेह,
जाणे निज – पर भेदने, वेदे शिव – सुख तेह. ३३.
अथाह शिष्यः, कथं तयोर्विशेष इति केनोपायेन स्वपरयोर्भेदो विज्ञायेत । तद्धि ज्ञातुश्च
किं स्यादित्यर्थः ।
गुरुराह —
गुरुपदेशादभ्यासात्संवित्तेः स्वपरान्तरम् ।
जानति यः स जानाति मोक्षसौख्यं निरन्तरम् ।।३३।।
यहाँ पर शिष्य कहता है कि किस उपायसे अपने और परमें विशेषता (भेद) जानी
जाती है, और उसके जाननेवालेको क्या होगा ? किस फलकी प्राप्ति होगी ? आचार्य कहते
हैं —
गुरु उपदेश अभ्याससे निज अनुभवसे भेद ।
निज पर को जो अनुभवे, लहै स्वसुख वेखेद ।।३३।।
१न जानन्ति शरीराणिं सुख – दुःखान्यबुद्धयः ।
निग्रहानुग्रहघियं तथाप्यत्रैव कुर्वते ।।६१।।
[समाधितन्त्र, श्री पूज्यपादाचार्यः ]