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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अन्वयार्थ : — [यः ] जे [गुरूपदेशात् ] गुरुना उपदेशथी [अभ्यासात् ] अभ्यास द्वारा
[संवित्तेः ] स्वसंवेदनथी [स्वपरान्तरं ] स्व – परनो भेद [जानाति ] जाणे छे, [सः ] ते [निरन्तरं ]
निरंतर [मोक्षसौख्यं ] मोक्षनुं सुख [जानाति ] अनुभवे छे.
टीका : — जे जाणे छे. शुं ते? स्व – परनुं अन्तर अर्थात् आत्मा अने परनो
भेद, — अर्थात् जे पोताना आत्माने परथी भिन्न देखे छे (जाणे छे) — एवो अर्थ छे.
कया कारणथी? संवित्तिथी (स्वसंवेदनथी) अर्थात् लक्षणथी पोताना लक्ष्यना (आत्माना)
अनुभवथी. ते पण केवी रीते? अभ्यासथी अर्थात् अभ्यासनी भावनाथी; ते (अभ्यास)
पण गुरुना उपदेशथी अर्थात् धर्माचार्यना तथा आत्माना सुद्रढ स्व – परनुं भेदज्ञान उत्पन्न
करनार वाक्यथी (थाय छे). तेवी रीते स्वात्माने परथी भिन्न अनुभव करनार ते निरंतर
एटले अविच्छिन्नपणे मोक्षसुखनो अनुभव करे छे, कारण के ते (मोक्षसुखनो) अनुभव,
कर्मोथी भिन्न आत्मानो अनुभव करनारने अविनाभावीपणे होय छे (बीजाने नहि).
तथा ‘तत्त्वानुशासन’ श्लोक १७०मां कह्युं छे केः —
टीका — यो जानाति । किं ? तत्स्वपरान्तरं आत्म - परयोर्भेदं, यः स्वात्मानं परस्माद्भिन्नं
पश्यतीत्यर्थः । कुतः हेतोः ? संवित्तेर्लक्षणतः स्वलक्ष्यानुभवात् । एषोऽपि कुतः ? अभ्यासात्
अभ्यासभावनातः । एषोऽपि गुरूपदेशात् धर्माचार्यस्यात्मनश्च सुदृढस्वपरविवेकज्ञानोत्पादक-
वाक्यात् । स तथान्यापोढस्वात्मानुभविता मोक्षसौख्यं निरन्तरमविच्छिन्नमनुभवति । कर्म-
विविक्तानुभाव्यविनाभावित्वात्तस्य ।
तथा चोक्तं [तत्त्वानुशासने ] —
अर्थ — जो गुरुके उपदेशसे अभ्यास करते हुए अपने ज्ञान (स्वसंवेदन)से अपने
और परके अन्तरको (भेदको) जानता है । वह मोक्षसम्बन्धी सुखका अनुभवन करता रहता
है ।
विशदार्थ — गुरु कहिये धर्माचार्य अथवा गुरु कहिये स्वयं आत्मा, उसके उपदेशसे
सुदृढ़ स्व पर विवेक ज्ञानके पैदा करनेवाले वाक्योंके और उसके अनुसार अभ्यास करना
चाहिये । बार बार अभ्यास करनेसे संवित्ति-अपने लक्ष्यका अनुभव होने लगता है । उस
संवित्ति (स्वसंवेदन)के द्वारा जो स्वात्माको परसे भिन्न जानता – देखता है, भिन्न आत्माका
अनुभव करनेवाला मोक्ष-सुखको निरन्तर हमेशा विच्छेद रहित अनुभव करने लग जाता
है । क्योंकि वह मोक्ष-सुखका अनुभव, कर्मोंसे भिन्न आत्माका अनुभव करनेवालोंको होता
है, अन्योंको नहीं । जैसा कि तत्त्वानुशासनमें कहा है — ‘‘तदेवानुभंवश्चाय०,’’