Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 34.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १०५
तेनो जआत्मानो ज अनुभव करतां करतां आ आत्मा उत्कृष्ट एकाग्रताने प्राप्त करे
छे अने वाणीने अगोचर (वाणीथी कही शकाय नहि तेवो) आत्माधीन आनंद अनुभवे छे.
भावार्थ :जे, गुरु एटले धर्माचार्यतेमना उपदेश अने शास्त्राभ्यासना निमित्ते
आत्मसंवेदनथी स्वपरना भेदविज्ञाननो वारंवार अभ्यास करे छे, ते आत्माने परथी भिन्न
अनुभवे छे अने मोक्षसुखनो निरंतर स्वाद ले छे, कारण के मोक्षसुखनो अनुभव कर्मो
आदिथी आत्माने भिन्न अनुभव करनारने ज होय छे, बीजाने नहि.
परथी भिन्न आत्मानो सतत अनुभव करनारने ज आत्मस्वरूपमां उत्कृष्ट स्थिरता
(एकाग्रता) प्राप्त थाय छे अने ते वचनातीत अतीन्द्रिय आत्माधीन आनंद अनुभवे छे. ३३.
पछी शिष्य पूछे छेते बाबतमां कोण गुरु छे? अर्थात् मोक्ष सुखना अनुभवना
विषयमां कोण गुरु छे?
गुरु कहे छेः
निज हित अभिलाषी स्वयं, निज हित नेता आत्म,
निज हित प्रेरक छे स्वयं, आत्मानो गुरु आत्म. ३४.
‘तमेवानुभवंश्चायमैकाग्रयं षरमृच्छति
तथात्माधीनमान्न्दमेति वाचामगोचरम्’ ।।१७० इत्यादि
अथ शिष्यः पृच्छतिकस्तत्र गुरुरिति तत्र मोक्षसुखानुभवविषये ?
गुरुराह
स्वस्मिन्सदभिलाषित्वादभीष्टज्ञापकत्वतः
स्वयं हित[तं ]प्रयोक्तृत्वादात्मैव गुरुरात्मनः ।।३४।।
उस आत्माका अनुभवन करते हुए यह आत्मा, उत्कृष्ट एकाग्रताको प्राप्त कर लेता
है, और इसी तरह मन तथा वाणीके अगोचर अथवा वचनोंसे भी न कहे जा सकनेवाले
स्वाधीन आनन्दको प्राप्त कर लेता है
।।३३।।
आगे शिष्य पूछता है कि मोक्ष-सुखके अनुभवके विषयमें कौन गुरु होता है ? आचार्य
कहते हैं
आपहिं निज हित चाहता, आपहि ज्ञाता होय
आपहिं निज हित प्रेरता, निज गुरु आपहि होय ।।३४।।