कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १०५
तेनो ज – आत्मानो ज अनुभव करतां करतां आ आत्मा उत्कृष्ट एकाग्रताने प्राप्त करे
छे अने वाणीने अगोचर (वाणीथी कही शकाय नहि तेवो) आत्माधीन आनंद अनुभवे छे.
भावार्थ : — जे, गुरु एटले धर्माचार्य — तेमना उपदेश अने शास्त्राभ्यासना निमित्ते
आत्मसंवेदनथी स्व – परना भेदविज्ञाननो वारंवार अभ्यास करे छे, ते आत्माने परथी भिन्न
अनुभवे छे अने मोक्षसुखनो निरंतर स्वाद ले छे, कारण के मोक्षसुखनो अनुभव कर्मो
आदिथी आत्माने भिन्न अनुभव करनारने ज होय छे, बीजाने नहि.
परथी भिन्न आत्मानो सतत अनुभव करनारने ज आत्मस्वरूपमां उत्कृष्ट स्थिरता
(एकाग्रता) प्राप्त थाय छे अने ते वचनातीत अतीन्द्रिय आत्माधीन आनंद अनुभवे छे. ३३.
पछी शिष्य पूछे छे — ते बाबतमां कोण गुरु छे? अर्थात् मोक्ष सुखना अनुभवना
विषयमां कोण गुरु छे?
गुरु कहे छेः —
निज हित अभिलाषी स्वयं, निज हित नेता आत्म,
निज हित प्रेरक छे स्वयं, आत्मानो गुरु आत्म. ३४.
‘तमेवानुभवंश्चायमैकाग्रयं षरमृच्छति ।
तथात्माधीनमान्न्दमेति वाचामगोचरम्’ ।।१७०। इत्यादि
अथ शिष्यः पृच्छति — कस्तत्र गुरुरिति तत्र मोक्षसुखानुभवविषये ?
गुरुराह —
स्वस्मिन्सदभिलाषित्वादभीष्टज्ञापकत्वतः ।
स्वयं हित[तं ]प्रयोक्तृत्वादात्मैव गुरुरात्मनः ।।३४।।
उस आत्माका अनुभवन करते हुए यह आत्मा, उत्कृष्ट एकाग्रताको प्राप्त कर लेता
है, और इसी तरह मन तथा वाणीके अगोचर अथवा वचनोंसे भी न कहे जा सकनेवाले
स्वाधीन आनन्दको प्राप्त कर लेता है ।।३३।।
आगे शिष्य पूछता है कि मोक्ष-सुखके अनुभवके विषयमें कौन गुरु होता है ? आचार्य
कहते हैं —
आपहिं निज हित चाहता, आपहि ज्ञाता होय ।
आपहिं निज हित प्रेरता, निज गुरु आपहि होय ।।३४।।