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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अन्वयार्थ : — (आत्मा) [स्वयं ] स्वयं [स्वस्मिन् ] पोतानामां [सद अभिलाषित्वात् ]
सत्नी (कल्याणनी या मोक्षसुखनी) अभिलाषा करतो होवाथी, [अभीष्टज्ञापकत्वतः ]
अभीष्टने (पोताना इच्छेला मोक्षसुखना उपायने) बतावतो होवाथी अने [हितप्रयोक्तृत्वात् ]
पोताना हितमां (मोक्षसुखना उपायमां) पोताने योजतो होवाथी [आत्मा एव ] आत्मा ज
[आत्मनः ] आत्मानो [गुरुः अस्ति ] गुरु छे.
टीका : — जे शिष्य सदा – निरंतर कल्याणनी (मोक्षसुखनी) अभिलाषा करे छे अने
तेथी तेना उपायनो जिज्ञासु छे, तेने (आत्मा – गुरु) ते उपाय बतावे छे अने ते उपाय
विषे नहि प्रवर्तता तेने तेमां प्रवर्तावे छे. ते गुरु खरेखर प्रसिद्ध छे.
एम होई, आत्मानो गुरु आत्मा ज होई शके.
(शिष्य) पूछे छे — केवी रीते?
स्वयं (आत्मा) आत्मा वडे मोक्षसुखना अभिलाषी आत्मामां सत् एटले प्रशस्त
मोक्षसुखनी निरंतर अभिलाषा करे छे; अर्थात् ‘मोक्षसुख मने प्राप्त थाओ’ एवा भावथी
आकांक्षा करे छे. तथा अभीष्ट (इच्छेला) अर्थात् आत्मा द्वारा जिज्ञासित मोक्षसुखना
उपायना जिज्ञासु आत्माने आत्मविषय संबंधी बतावनार होवाथी अर्थात् ‘आ मोक्षसुखनो
टीका — यः खलु शिष्यः सदा अभीक्ष्णं कल्याणमभिलषति तेन जिज्ञास्यमानं तदुपायं
तं ज्ञापयति । तत्र चाप्रवर्त्तमानं तं प्रवर्तयति स किल गुरुः प्रसिद्धः । एवं च सत्यात्मनः आत्मैव
गुरुः स्यात् । कुत इत्याह — स्वयमात्मना स्वस्मिन्मोक्षसुखाभिलाषिण्यात्मनि सत् प्रशस्तं
मोक्षसुखमभीक्ष्णमभिलषति । मोक्षसुखं मे सम्पद्यतामित्याकाङ्क्षतीत्येवंभावात् । तथाभीष्टस्यात्मना
जिज्ञास्यमानस्य मोक्षसुखोपायस्यात्मविषये ज्ञापकत्वादेष मोक्षसुखोपायो मया सेव्य इति
अर्थ — जो सत्का कल्याणका वांछक होता है, चाहे हुए हितके उपायोंको जतलाता
है, तथा हितका प्रवर्त्तक होता है, वह गुरु कहलाता है । जब आत्मा स्वयं ही अपनेमें
सत्की – कल्याणकी यानी मोक्ष-सुखकी अभिलाषा करता है, अपने द्वारा चाहे हुए मोक्ष-
सुखके उपायोंको जतलानेवाला है, तथा मोक्ष-सुखके उपायोंमें अपने आपको प्रवर्तन
करानेवाला है, इसलिए अपना (आत्माका) गुरु आप (आत्मा) ही है ।
विशदार्थ — यह आत्मा स्वयं ही जब मोक्ष सुखाभिलाषी होता है, तब सत्की यानी
मोक्ष-सुखकी हमेशा अभिलाषा करता रहता है, कि मुझे मोक्ष-सुख प्राप्त हो जावे । इसी
तरह जब स्वयं आत्मा मोक्ष-सुखके उपायोंको जानना चाहता है, तब यह स्वयं मोक्षके
सुखके उपायोंको जतलानेवाला बन जाता है, कि यह मोक्ष-सुखके उपाय मुझे करना