कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १०७
उपाय मारे (आत्माए) सेववा योग्य छे एवो बोध करतो होवाथी तथा स्वयं मोक्षसुखना
उपायमां स्वने (आत्माने) प्रयुक्त करतो (योजतो) होवाथी, ‘आ सुदुर्लभ मोक्षसुखना
उपायमां, हे दुरात्मन् आत्मा! तुं स्वयं आज सुधी प्रवृत्त थयो नहि’ ए रीते त्यां
(उपायमां) अप्रवृत्त आत्माने प्रवर्तावनार होवाथी (आत्मा ज आत्मानो गुरु छे).
भावार्थः — मोक्षसुखनो अभिलाषी आत्मा स्वयं आत्मानो गुरु छे, कारण के ते
स्वयं ज पोतानुं कल्याण इच्छे छे, ते स्वयं पोताने मोक्षना उपायनो बोध करे छे अने स्वयं
पोताने मोक्षसुखना उपायमां योजे छे (लगावे छे).
श्री समाधितंत्र श्लोक* ७५मां कह्युं छे केः —
‘आत्मा ज आत्माने जन्म – मरणरूप संसारमां भ्रमण करावे छे अने आत्मा ज
आत्माने निर्वाण प्रति लई जाय छे, माटे निश्चयथी आत्मा ज आत्मानो गुरु छे, बीजो
कोई गुरु नथी.’
अहीं शिष्य आक्षेप करी कहे छे — ‘‘ए रीते अन्यनी उपासना प्राप्त थती नथी,
अर्थात् हे भगवन्! उक्त नीति अनुसार परना गुरुपणानो+ अभाव थतां, मुमुक्षुने
बोधकत्वात् । तथाहि ते मोक्षसुखोपाये स्वयं स्वस्य प्रयोक्तृत्वात् । अस्मिन् सुदुर्लभे मोक्षसुखोपाये
दुरात्मन्नात्मन्स्वयमद्यापि न प्रवृत्तः इति । तत्रावर्त्तमानस्यात्मनः प्रवर्त्तकत्वात् ।
अथ शिष्यः साक्षेपमाह । एवं नान्योपास्तिः प्राप्नोतीति भगवन्नुक्तनीत्या परस्यगुरुत्वे
चाहिए । इसी तरह अपने आपको मोक्ष-उपायमें लगानेवाला भी वह स्वयं हो जाता है, कि
इस सुदुर्लक्ष मोक्ष सुखोपायमें हे दुरात्मन् आत्मा ! तुम आज तक अर्थात् अभी तक भी
प्रवृत्त नहीं हुए । इस प्रकार अभी तक न प्रवर्तनेवाले आत्माका प्रवर्तक भी हुआ करता
है । इसलिये स्वयं ही आत्मा अपने कल्याणका चाहनेवाला, अपनेको सुखोपाय बतलानेवाला
और सुखोपायमें प्रवृत्ति करनेवाला होनेसे अपना गुरु है ।।३४।।
यहाँ पर शिष्य आक्षेप सहित कहता है कि इस तरह तो अब अन्य दूसरोंकी क्यों
*नयत्यान्मानमात्मैव जन्म निर्वाणमेव वा ।
गुरुरात्मात्मनस्तस्मान्नान्योऽस्ति परमार्थतः ।।७५।।[समाधितन्त्रे – श्री पूज्यपादाचार्यः ]
+इडर सरस्वती भंडारनी हस्तलिखित प्रतमां ‘परस्परगुरुत्वे निश्चिते’ने बदले ‘परस्यगुरुत्वे निरस्ते’ शब्दो
छे अने ते योग्य लागे छे. तेथी ते प्रमाणे अहीं अर्थ कर्यो छे.