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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
धर्माचार्यादिनी सेवा प्राप्त थती नथी. मुमुक्षुने धर्माचार्यादि सेववा योग्य रहेता नथी एवो
भाव छे, परंतु एम नथी, कारण के एम कहेवामां अपसिद्धान्तनो प्रसंग आवे छे.
आवुं बोलनार शिष्य प्रति आचार्य जवाब आपे छेः —
मूर्ख न ज्ञानी थई शके, ज्ञानी मूर्ख न थाय,
निमित्तमात्र सौ अन्य तो, धर्मद्रव्यवत् थाय. ३५.
अन्वयार्थ : — [अज्ञः ] जे पुरुष अज्ञानी छे (अर्थात् तत्त्वज्ञाननी उत्पत्ति माटे
अयोग्य छे – ते) [विज्ञत्वं न आयाति ] विज्ञ थई शकतो नथी अने [विज्ञः ] जे विशेष ज्ञानी
छे ते [अज्ञत्वं न ऋच्छति ] अज्ञानी थई शकतो नथी; जेम (जीव पुद्गलनी) [गतेः ] गतिमां
[धर्मास्तिकायवत् निमित्तमात्रम् ] धर्मास्तिकाय निमित्तमात्र छे, तेम [अन्यः तु ] अन्य (पदार्थ)
पण निमित्तमात्र (धर्मास्तिकायवत्) छे.
टीका : — भद्र! अज्ञ एटले तत्त्वज्ञाननी उत्पत्तिने माटे अयोग्य अभव्यादिक
निरस्ते सति धर्माचार्यादिसेवनं न प्राप्नोति मुमुक्षुः । मुमुक्षुणा धर्माचार्यादिः सेव्यो न भवतीति
भावः । न चैवमेतदिति वाच्यमपसिद्धान्तप्रसङ्गात् ।
इति वदन्तं प्रत्याह —
नाज्ञो विज्ञत्वमायाति विज्ञो नाज्ञत्वमृच्छति ।
निमित्तमात्रमन्यस्तु गतेर्धर्मास्तिकायवत् ।।३५।।
टीका — भद्र ! अज्ञस्तत्त्वज्ञानोत्पत्ययोग्योऽभव्यादिर्विज्ञत्वं तत्त्वज्ञत्वं धर्माचार्याद्युपदेश-
सहस्रेणापि न गच्छति ।
सेवा करनी होगी ? बस जब आपसमें खुदका खुद ही गुरु बन गया, तब धर्माचार्यादिकोंकी
सेवा मुमुक्षुओंको नहीं करनी होगी । ऐसा भी नहीं कहना चाहिए, कि हाँ ऐसा तो है ही,
कारण कि वैसा माननेसे अपसिद्धान्त हो जाएगा । ऐसे बोलनेवाले शिष्यके प्रति आचार्य
जवाब देते हैं —
मूर्ख न ज्ञानी हो सके, ज्ञानी मूर्ख न होय ।
निमित्त मात्र पर जान, जिमि गति धर्मतें होय ।।३५।।
अर्थ — तत्त्वज्ञानकी उत्पत्तिके अयोग्य अभव्य आदिक जीव, तत्त्वज्ञानको