Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १०९
जीव, धर्माचार्यादिना हजारो उपदेशोथी पण विज्ञत्वनेतत्त्वज्ञानने प्राप्त करी शकतो नथी.
तथा कह्युं छे केः
‘(कोई कार्यनी) उत्पत्तिमां स्वाभाविक गुणनी अपेक्षा रहे छे. सेंकडो व्यापारोथी
(प्रयत्नोथी) पण बगलो पोपटनी माफक भणावी शकातो नथी.’
तेम विज्ञ एटले तत्त्वज्ञाने परिणत जीव हजारो उपायोथी पण अज्ञानपणाने प्राप्त
थतो नथी अर्थात् तत्त्वज्ञानथी परिभ्रष्ट थतो नथी.
वळी, ‘पद्मनन्दिपंचविंशतिका’श्लोक ६३, पृ. ३३मां कह्युं छे केः
‘जेना भयथी गभराई जई दुनियाना लोक मार्ग छोडी, अहीं तहीं भागी जाय
तेवुं वज्र पडे छतां प्रशमभावसंपन्न योगीओ योगथी (ध्यानथी) चलायमान थता नथी,
तो ज्ञानरूपी प्रदीपथी जेमणे मोहरूपी महान्धकारनो नाश करी दीधो छे एवा सम्यग्द्रष्टि
तथा चोक्तम्
‘स्वाभाविकं हि निष्पत्तौ क्रियागुणमपेक्ष्यते
न व्यापारशतेनापि शुकवत्पापाठयते बकः’ ।।
तथा विज्ञस्तत्त्वज्ञानपरिणतो अज्ञत्वं तत्त्वज्ञानात्परिभ्रंशमुपायसहस्रेणापि न गच्छति
तथा चोक्तम्
‘वज्रे पतत्यपि भयद्रुतविश्वलोके मुक्ताध्वनि प्रशमिनो न चलन्ति योगात्
बोधप्रदीपहतमोहमहान्धकाराः सम्यग्दृशः किमुत शेषपरीषहेषु’ ।।६३।।
धर्माचार्यादिकोंके हजारों उपदेशोंसे भी नहीं प्राप्त कर सकता है, जैसा कि कहा गया है
‘‘
स्वाभाविकं हि निष्पत्तौ’’
‘‘कोई भी प्रयत्न कार्यकी उत्पत्ति करनेके लिये स्वाभाविक गुणकी अपेक्षा किया
करता है सैकड़ों व्यापारोंसे भी बगुला तोतेकी तरह नहीं पढ़ाया जा सकता है ’’
इसी तरह तत्त्वज्ञानी जीव, तत्त्वज्ञानसे छूटकर हजारों उपायोंके द्वारा भी अज्ञत्वको
प्राप्त नहीं कर सकता जैसा कि कहा गया है‘‘वज्रे पतत्यपि’’
‘‘जिसके कारण भयसे घबराई हुई सारी दुनियाँ मार्गको छोड़कर इधर उधर
भटकने लग जाय, ऐसे वज्रके गिरने पर भी अतुल शांतिसम्पन्न योगिगण योगसे (ध्यानसे)
चलायमान नहीं होते
तब ज्ञानरूपी प्रदीपसे जिन्होंने मोहरूपी महान् अन्धकारको नष्ट कर