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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
जीवो, शेष परीषहो आवी पडतां, शुं चलायमान थशे? (नहि, तेओ कदी पण चलायमान
थशे नहि).
— ए रीते तो बाह्य निमित्तो ऊडी जशे! एम अत्रे कहे छे.
‘अन्य अर्थात् गुरु तथा शत्रुआदि, प्रकृत कार्यनी उत्पत्तिमां तथा नाशमां
निमित्तमात्र छे, कारण के त्यां योग्यता ज साक्षात् साधक छे.
कोनो कोण? जेम ‘गतेरित्यादि’०थी अहीं कहे छे तेम.
आनो अर्थ ए छे के — जेम के युगपद् (एकी साथे) भावी गतिरूप परिणाम माटे
उन्मुख (ते तरफ वलणवाळा) पदार्थोनी पोतानी गमनशक्ति ज गतिने साक्षात् उत्पन्न करे
छे; तेना विकलपणामां (एटले पदार्थोमां गमन प्रति उन्मुखता न होय त्यारे) तेमां कोईथी
(कांई) करवुं अशक्य छे (अर्थात् तेमां कोई गति उत्पन्न करी शके नहि). धर्मास्तिकाय
तो गति – उपग्राहकरूप (गतिमां निमित्तरूप) द्रव्यविशेष छे; ते तेने (गतिने) सहकारी
कारणमात्र छे. ए रीते प्रकृतमां पण (आ विषयमां पण) समजवुं. तेथी व्यवहारथी ज
नन्वेवं बाह्यनिमित्तक्षेपः प्राप्नोतीत्यत्राह । अन्यः पुनर्गुरूविपक्षादिः प्रकृतार्थसमुत्पाद-
भ्रंशयोर्निमित्तमात्रं स्यात्तत्र योग्यताया एव साक्षात्साधकत्वात् ।
कस्याः को यथेत्यत्राह, गतेरित्यादि । अयमर्थो यथा युगपद्भाविगतिपरिणामोन्मुखानां
भावानां स्वकीया गतिशक्तिरेव गतेः साक्षाज्जनिका, तद्वैकल्पे तस्याः केनापि कर्त्तुमशक्यत्वात् ।
धर्मास्तिकायस्तु गत्युपग्राहकद्रव्यविशेषस्तस्याः सहकारिकारणमात्रं स्यादेवं प्रकृतेऽपि । अतो
दिया है, ऐसे सम्यग्दृष्टि जीव क्या शेष परीषहोंके आने पर चलायमान हो जायँगें ? नहीं,
वे कभी भी चलायमान नहीं हो सकते हैं ।’’
यहाँ शंका यह होती है कि यों तो बाह्य निमित्तोंका निराकरण ही हो जाएगा ?
इसके विषयमें जवाब यह है कि अन्य जो गुरु आदिक तथा शत्रु आदिक हैं, वे प्रकृत
कार्यके उत्पादनमें तथा विध्वंसनमें सिफ र् निमित्तमात्र हैं । वास्तवमें किसी कार्यके होने व
बिगड़नेमें उसकी योग्यता ही साक्षात् साधक होती है । जैसे एक साथ गतिरूप परिणामके
लिये उन्मुख हुए पदार्थोंमें गतिकी साक्षात् पैदा करनेवाली उन पदार्थोंकी गमन करनेकी
शक्ति है । क्योंकि यदि पदार्थोंमें गमन करनेकी शक्ति न होवे तो उनमें किसीके द्वारा
भी गति नहीं की जा सकती । धर्मास्तिकाय तो गति करानेमें सहायकरूप द्रव्यविशेष है ।
इसलिये वह गतिके लिये सहकारी कारणमात्र हुआ करता है । यही बात प्रकृतमें भी जाननी