Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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११० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
जीवो, शेष परीषहो आवी पडतां, शुं चलायमान थशे? (नहि, तेओ कदी पण चलायमान
थशे नहि).
ए रीते तो बाह्य निमित्तो ऊडी जशे! एम अत्रे कहे छे.
‘अन्य अर्थात् गुरु तथा शत्रुआदि, प्रकृत कार्यनी उत्पत्तिमां तथा नाशमां
निमित्तमात्र छे, कारण के त्यां योग्यता ज साक्षात् साधक छे.
कोनो कोण? जेम ‘गतेरित्यादि’०थी अहीं कहे छे तेम.
आनो अर्थ ए छे केजेम के युगपद् (एकी साथे) भावी गतिरूप परिणाम माटे
उन्मुख (ते तरफ वलणवाळा) पदार्थोनी पोतानी गमनशक्ति ज गतिने साक्षात् उत्पन्न करे
छे; तेना विकलपणामां (एटले पदार्थोमां गमन प्रति उन्मुखता न होय त्यारे) तेमां कोईथी
(कांई) करवुं अशक्य छे (अर्थात् तेमां कोई गति उत्पन्न करी शके नहि). धर्मास्तिकाय
तो गति
उपग्राहकरूप (गतिमां निमित्तरूप) द्रव्यविशेष छे; ते तेने (गतिने) सहकारी
कारणमात्र छे. ए रीते प्रकृतमां पण (आ विषयमां पण) समजवुं. तेथी व्यवहारथी ज
नन्वेवं बाह्यनिमित्तक्षेपः प्राप्नोतीत्यत्राह अन्यः पुनर्गुरूविपक्षादिः प्रकृतार्थसमुत्पाद-
भ्रंशयोर्निमित्तमात्रं स्यात्तत्र योग्यताया एव साक्षात्साधकत्वात्
कस्याः को यथेत्यत्राह, गतेरित्यादि अयमर्थो यथा युगपद्भाविगतिपरिणामोन्मुखानां
भावानां स्वकीया गतिशक्तिरेव गतेः साक्षाज्जनिका, तद्वैकल्पे तस्याः केनापि कर्त्तुमशक्यत्वात्
धर्मास्तिकायस्तु गत्युपग्राहकद्रव्यविशेषस्तस्याः सहकारिकारणमात्रं स्यादेवं प्रकृतेऽपि अतो
दिया है, ऐसे सम्यग्दृष्टि जीव क्या शेष परीषहोंके आने पर चलायमान हो जायँगें ? नहीं,
वे कभी भी चलायमान नहीं हो सकते हैं
’’
यहाँ शंका यह होती है कि यों तो बाह्य निमित्तोंका निराकरण ही हो जाएगा ?
इसके विषयमें जवाब यह है कि अन्य जो गुरु आदिक तथा शत्रु आदिक हैं, वे प्रकृत
कार्यके उत्पादनमें तथा विध्वंसनमें सिफ र् निमित्तमात्र हैं
वास्तवमें किसी कार्यके होने व
बिगड़नेमें उसकी योग्यता ही साक्षात् साधक होती है जैसे एक साथ गतिरूप परिणामके
लिये उन्मुख हुए पदार्थोंमें गतिकी साक्षात् पैदा करनेवाली उन पदार्थोंकी गमन करनेकी
शक्ति है
क्योंकि यदि पदार्थोंमें गमन करनेकी शक्ति न होवे तो उनमें किसीके द्वारा
भी गति नहीं की जा सकती धर्मास्तिकाय तो गति करानेमें सहायकरूप द्रव्यविशेष है
इसलिये वह गतिके लिये सहकारी कारणमात्र हुआ करता है यही बात प्रकृतमें भी जाननी