Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १११
गुरु आदिनी शुश्रूषा (सेवा) करवी योग्य छे.
भावार्थ :ज्ञानी के अज्ञानी बनवानी योग्यता पोताना आत्मामां ज छे. गुरु
आदि तो बाह्य निमित्तमात्र छे, तेओ कोईने ज्ञानी के अज्ञानी बनावी शकता नथी.
पदार्थोमां परिणमन माटे जे उन्मुख योग्यता होय छे ते रूप ज कार्य उत्पन्न
(निष्पन्न) थाय छे, कारण के कारणानुविधायीनि कार्याणिकारण जेवां ज कार्यो होय छे.
अन्य पदार्थो तो तेना परिणमनमां निमित्तमात्र छे. प्रत्येक पदार्थनी परिणमनउन्मुखता
क्षणिक उपादान ज कार्यरूपे परिणमे छे.
जीव अने पुद्गल द्रव्यमां गमन करवानी स्वयं शक्ति छे, तेथी जे समये तेओ
पोतानी क्रियावती शक्तिनी जे प्रकारनी परिणमनउन्मुखताथी गमन करे छे; ते प्रकारे ते
समये धर्मद्रव्य, तेमना गमनमां निमित्तमात्र होय छे. परिणाम प्रति पदार्थोनी उन्मुखता
ज (ते समयनी योग्यता ज) कार्यनुं साक्षात् उपादान कारण छे.
गुरु शिष्यने शीखवे छेए व्यवहारनयनुंनिमित्तनुं कथन छे, एटले के शिष्य
पोतानी उपादानशक्तिथी शीखे तो गुरु निमित्तमात्र कहेवाय. आ कथन, कार्योत्पत्तिसमये
अनुकूळ कयुं निमित्त हतुं, तेनुं ज्ञान करावी तेना तरफनुं वलण छोडाववा माटे छे, एम
समजवुं.
वस्तुतः कोई कोईने शीखवी शके नहि, कारण के ए सिद्धान्त छे के ‘सर्व द्रव्यो
पोतपोताना स्वभावथी ऊपजे छे, अन्य द्रव्यथी अन्य द्रव्यना गुणनी (पर्यायनी) उत्पत्ति
करी शकाती नथी.’+
छए द्रव्योनी विकारी के अविकारी पर्यायोमां बधां निमित्तो धर्मास्तिकायवत्
निमित्तमात्र छे. प्रेरक अने उदासीन निमित्तो तेना पेटा प्रकारो छे, परंतु उपादान प्रत्ये
तो ते सदा धर्मास्तिकायवत् उदासीन निमित्तमात्र छे.
व्यवहारादेव गुर्वादेः सुश्रूषा प्रतिपत्तव्या
चाहिये इसलिये व्यवहारसे ही गुरु आदिकोंकी सेवा, शुश्रूषा आदि की जानी चाहिए ।।३५।।
+ को द्रव्य बीजा द्रव्यने उत्पाद नहि गुणनो करे,
तेथी बधाये द्रव्य निज स्वभावथी ऊपजे खरे.
(श्री समयसार गु. आवृत्ति गाथा३७२)