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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
हवे शिष्य कहे छे — (आत्मस्वरूपनो) अभ्यास केवी रीते (कराय)? आ
अभ्यासना प्रयोगना उपाय संबंधी प्रश्न छे.
(कोई ठेकाणे ‘अभ्यासः कथ्यते’ — अभ्यास कहेवामां आवे छे – एवो पाठ छे). त्यां
(ते बाबतमां) वारंवार प्रवृत्ति लक्षणात्मक अभ्यास सारी रीते प्रसिद्ध छे; तेना स्थान
नियमादिरूपे अभ्याससंबंधी उपदेश करवामां आवे छे – एवो अर्थ छे.
ए रीते संवित्ति (स्वसंवेदन) संबंधी कहेवामां आवे छे — एम पाठनी अपेक्षाए
उत्तर पातनिकानुं पण व्याख्यान समजवुं (अर्थात् साथे साथे संवित्तिनुं पण वर्णन
समजवुं). ३५.
गुरुए ज ते बंने वाक्योनी व्याख्या करवी योग्य छे.
शिष्यना बोध माटे गुरु कहे छेः —
क्षोभरहित एकान्तमां स्वरूप स्थिर थई खास,
योगी तजी परमादने कर तुं तत्त्वाभ्यास. ३६.
अथाह शिष्यः । अभ्यासः कथमिति । अभ्यासप्रयोगोपायप्रश्नोऽयम् । अभ्यासः कथ्यत
इति क्वचित् पाठः । तत्राभ्यासः स्यात् भूयोभूय प्रवृत्तिलक्षणत्वेन सुप्रसिद्धत्वात्तस्य
स्थाननियमादिरूपेणोपदेशः क्रियत इत्यर्थः । एवं संवित्तिरुच्यत इत्युत्तरपातनिकाया अपि
व्याख्यानमेतत्पाठापेक्षया द्रष्टव्यम् ।
तथा च गुरूरेवैते वाक्ये व्याख्येये । शिष्यबोधार्थं गुरुराह —
अभवच्चित्तविक्षेप एकान्ते तत्त्वसंस्थितः ।
अभ्यस्येदभियोगेन योगी तत्त्वं निजात्मनः ।।३६।।
अब शिष्य कहता है कि ‘अभ्यास कैसे किया जाता है ?’ इसमें अभ्यास करनेके
उपायोंको पूछा गया है । सो अभ्यास और उसके उपायोंको कहते हैं । बार बार प्रवृत्ति
करनेको अभ्यास कहते हैं । यह बात तो भलीभाँति प्रसिद्ध ही है । उसके लिये स्थान कैसा
होना चाहिए ? कैसे नियमादि रखने चाहिए ? इत्यादि रूपसे उसका उपदेश किया जाता
है । इसी प्रकार साथमें संवित्तिका भी वर्णन करते हैं ।
क्षोभ रहित एकान्त में, तत्त्वज्ञान चित धाय ।
सावधान हो संयमी, निज स्वरूपको भाय ।।३६।।