कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ११३
अन्वयार्थ : — [अभवत् चित्तविक्षेपः ] जेना चित्तमां क्षोभ नथी (अर्थात् जेना
चित्तमां राग – द्वेषादि विकार परिणतिरूप क्षोभ – विक्षेप नथी) तथा जे [तत्त्वसंस्थितः ] तत्त्वमां
(आत्मस्वरूपमां) सारी रीते स्थित छे, तेवा [योगो ] योगीए [अभियोगेन ] सावधानीपूर्वक
(अर्थात् आळस, निद्रादिना परित्यागपूर्वक) [एकान्ते ] एकान्त स्थानमां [निजात्मनःतत्वं ]
पोताना आत्मतत्त्वनो [अभ्यस्येत् ] अभ्यास करवो.
टीका : — अभ्यास करवो भाववो. कोणे ते? योगीए – संयमीए. शुं (अभ्यास
करवो)? आत्मा संबंधी तत्त्वनो. कोनो? निज आत्मानो ( – पोताना स्वरूपनो) शा वडे?
अभियोग वडे अर्थात् आळस, निद्रादिना त्याग वडे. कयां (अभ्यास करवो)? एकान्तमां
एटले योग्य खाली गृहादिमां. केवा प्रकारनो थईने? जेना चित्तमां – मनमां विक्षेप अर्थात्
रागादिरूप क्षोभ नथी तेवो थईने? कहे छे, ‘आवो’ केवा थईने – तत्त्वमां सारी रीते स्थित
अर्थात् तत्त्व एटले हेय – उपादेय तत्त्वोमां गुरुना उपदेशथी जेनी बुद्धि निश्चल थई गई
छे, तेवो थईने अथवा परमार्थरूपे साध्य वस्तुमां सम्यक्प्रकारे स्थित एटले जेवा कह्या छे;
तेवा कायोत्सर्गादि द्वारा व्यवस्थित – थईने.
भावार्थ : — ज्यां सुधी राग – द्वेषादि विकल्पोथी चित्त विक्षिप्त रहे छे — आकुलित
रहे छे, त्यां सुधी आत्मस्वरूपनुं ध्यान थई शकतुं नथी. *समाधितंत्र श्लोक ३५मां कह्युं
छे केः —
टीका — अभ्यस्येद्भावयेत्कोसौ ? योगी संयमी । किं ? तत्त्वं यथात्म्यं । कस्य ?
निजात्मनः । केन ? अभियोगेन आलस्यनिद्रादिनिरासेन । क्वं ? एकान्ते योग्यशून्यगृहादौ । किं
विशिष्टः सन् ? अभवन्नजायमानश्चित्तस्य मनसो विक्षेपो रागादिसंक्षोभो यस्य सोऽयमित्थंभूतः
सन् । किंभूतो भूत्वा ? तथाभूत इत्याह । तत्वसंस्थितस्तत्त्वे हेये उपादेये च गुरूपदेशान्निश्चलधी
अर्थ — जिसके चित्तमें क्षोभ नहीं है, जो आत्मा स्वरूप रूपमें स्थित है, ऐसा योगी
सावधानीपूर्वक एकान्त स्थानमें अपने आत्माके स्वरूपका अभ्यास करे ।
विशदार्थ — नहीं हो रहे हैं चित्तमें विक्षेप-रागादि विकल्प जिसको ऐसा तथा हेय-
उपादेय तत्त्वोंमें गुरुके उपदेशसे जिसकी बुद्धि निश्चल हो गई है, अथवा परमार्थरूपसे
साध्यभूत वस्तुमें भले प्रकारसे – यानी जैसे कहे गये हैं, वैसे कायोत्सर्गादिकोंसे व्यवस्थित
हो गया है, ऐसा योगी अपनी आत्माके ठीक ठीक स्वरूपका एकान्त स्थानोंमें – योगीके लिये
*रागद्वेषादिकल्लोलैरलोलं यन्मनोजलम् ।
स पश्यत्यात्मनस्तत्त्वं तत् तत्त्वं नेतरो जनः ।।३५।।
[समाधितन्त्रे — श्री पूज्यपादाचार्यः ]