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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
‘‘जेनुं मनरूपी जल राग – द्वेषादि तरंगोथी चंचल (विक्षिप्त) थतुं नथी, ते ज पुरुष
आत्माना यथार्थ स्वरूपनो अनुभव करे छे; राग – द्वेषादि कल्लोलोथी आकुलित चित्तवाळो
पुरुष आत्म – तत्त्वनो अनुभव करी शकतो नथी.’’
माटे योगीए प्रथम गुरुना उपदेशथी हेय – उपादेय तत्त्वोमां बुद्धि निश्चल करी
पोताना चित्तने मोह – क्षोभरहित करवुं, पछी कायोत्सर्गादि द्वारा व्यवस्थित थई
एकान्तमां — शून्य गृहमां के पर्वतनी गुफामां — आळस तथा निद्रादिनो त्याग करी पोताना
आत्माना यथार्थ स्वरूपनो अभ्यास करवो.
आ श्लोकमां आत्मस्वरूपना अभ्यास माटे आचार्ये नीचेना मुख्य त्रण उपायो
सूचव्या छेः —
१. गुरुना उपदेश द्वारा हेय – उपादेय तत्त्वोमां अर्थात् स्व – परना भेदविज्ञानमां बुद्धिने
स्थिर करवी;
२. चित्तने मोह – क्षोभरहित करवुं अर्थात् राग – द्वेषादि विकल्पोथी विक्षिप्त न करवुं;
३. प्रमादनो त्याग करी एकान्तमां आत्मस्वरूपना अनुभवनो अभ्यास करवो. ३६.
हवे शिष्य कहे छे — ‘संवित्ति’ एटले अभ्यास केवी रीते अनुवर्ताय (कराय)? आ
अर्थ (भाव) संयमित करातो नथी ( – अर्थात् आटलाथी पूरो थतो नथी).
भगवान! उक्त लक्षणवाळी संवित्ति (आत्मानुभव) थई रही छे ते योगीने कया
उपायथी जाणी शकाय? अने प्रतिक्षण तेनो प्रकर्ष थई रह्यो छे ते पण केवी रीते जाणी
शकाय?
यदि वा तत्त्वेन साध्ये वस्तुनि सम्यक् स्थितो यथोक्तकायोत्सर्गादिना व्यवस्थितः ।
अत्राह शिष्यः संवित्तिरिति अभ्यासः कथमित्यनुवर्त्यन्ते नायमर्थः संयम्यते । भगवन् !
उक्तलक्षण संवित्तिः प्रवर्तमाना केनोपायेन योगिनो विज्ञायते कथं च प्रतिक्षणं प्रकर्षमापद्यते ।
योग्य ऐसे शून्य गृहोंमें ? पर्वतोंकी गुहा कंदरादिकोंमें, आलस्य निद्रा आदिको दूर करते
हुए अभ्यास करे ।।३६।।
यहाँ पर शिष्य पूछता है कि भगवन् ! जिसका लक्षण कहा गया है ऐसी ‘संवित्ति
हो रही है ।’ यह बात योगीको किस तरहसे मालूम हो सकती है ? और उसकी हरएक
क्षणमें उन्नति हो रही है, यह भी कैसे जाना जा सकता है ?