कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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अहीं, आचार्य कहे छे — ‘हे धीमन्! सांभळ, हुं तेना चिह्ननुं वर्णन करुं छुं’ —
एवो अर्थ छे.
ज्यम ज्यम संवेदन विषे आवे उत्तम तत्त्व,
सुलभ मळे विषयो छतां, जरीये करे न ममत्व. ३७.
अन्वयार्थ : — [यथा यथा ] जेम जेम [उत्तमं तत्त्वं ] उत्तम तत्त्व [संवित्तौ ]
अनुभवमां [समायाति ] आवे छे, [तथा तथा ] तेम तेम [सुलभाः अपि विषयाः ] सुलभ
विषयो पण [न रोचन्ते ] रुचता नथी (गमता नथी).
टीका : — जे जे प्रकारे योगीनी संवित्तिमां (स्वानुभवरूप संवेदनमां) शुद्धात्मानुं
स्वरूप आवे छे (झलके छे) सन्मुख थाय छे, तेम अनायासे (सहजमां) प्राप्त थता रम्य
(रमणीक) इन्द्रियविषयो पण भोग्यबुद्धिने उत्पन्न करी शकता नथी. (भोगववायोग्य छे,
एवी बुद्धि – इच्छा उत्पन्न करी शकता नथी), कारण के महासुखनी प्राप्ति थतां अल्पसुखना
अत्राचार्यो वक्ति । उच्यत इति धीमन्नाकर्णय वर्ण्यते तल्लिङ्गं तावन्मयेत्यर्थः ।
यथा यथा समायाति संवित्तौ तत्त्वमुत्तमम् ।
तथा तथा न रोचन्ते विषयाः सुलभा अपि ।।३७।।
टीका — येन येन प्रकारेण संवित्तौ विशुद्धात्मस्वरूपं सांमुख्येनागच्छति योगिनः तथा
तथानायासलभ्या अपि रम्येन्द्रियार्था भोग्यबुद्धिं नोत्पादयन्ति महासुखलब्धावऽल्पसुखकारणानां
लोकेऽप्यनादरणीयत्वदर्शनात् । तथा चोक्तम् —
आचार्य कहते हैं, कि हे धीमन् ? सुनो मैं उसके चिन्हका वर्णन करता हूँ —
जस जस आतम तत्त्वमें, अनुभव आता जाय ।
तस तस विषय सुलभ्य भी, ताको नहीं सुहाय ।।३७।।
अर्थ — ज्यों ज्यों संवित्ति (स्वानुभव)में उत्तम तत्त्वरूपका अनुभवन होता है, त्यों
त्यों उस योगीको आसानीसे प्राप्त होनेवाले भी विषय अच्छे नहीं लगते ।
विशदार्थ — जिस जिस प्रकारसे योगीकी संवित्तिमें (स्वानुभवरूप संवेदनमें) शुद्ध
आत्माका स्वरूप झलकता जाता है, सन्मुख आता है, तैसे-तैसे बिना प्रयाससे, सहजमें
ही प्राप्त होनेवाले रमणीक इन्द्रिय विषय भी योग्य बुद्धिको पैदा नहीं कर पाते हैं । ठीक