Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 116 of 146
PDF/HTML Page 130 of 160

 

background image
११६ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
कारणो प्रति लोकमां (दुनियामां) पण अनादर देखाय छे. कह्युं छे के
जेमनुं मन शान्ति सुखथी संपन्न छे तेवा (महापुरुषोने) भोजन पण द्वेष उत्पन्न
करे छे (अर्थात् तेमने भोजन पण गमतुं नथीते प्रति उदासीन होय छे), तो विषय
भोगोनी वात ज शुं करवी (अर्थात् तेमने विषय भोगो रुचिकर लागता नथी).
माछलीओना अंगने जमीन ज बाळे छे, तो अग्निना अंगारानी तो वात ज शुं! (ते
तो तेने बाळी ज नाखे).
तेथी विषयोनी अरुचि ज योगीनी स्वात्मसंवित्ति (स्वात्मानुभव)नुं ज्ञान करावे
छे.
तेना अभावमां (अर्थात् स्वात्मसंवित्तिना अभावमां तेनो (एटले विषयो प्रति
अरुचिनो) अभाव होय छे, अने विषयो प्रति अरुचि वधतां स्वात्मसंवित्ति पण प्रकर्षता
पामे छे (वृद्धि पामे छे).
भावार्थ :आत्मस्वरूपनुं भान थतां, विषयो प्रति भोग्यबुद्धि उत्पन्न थती नथी.
जेम जेम योगीने स्वानुभवरूप स्वसंवेदनमां आत्मानो आनंद आवे छे, तेम तेम सुलभ्य
रम्य विषयो तरफथी पण तेनुं मन हठतुं जाय छे, अर्थात् सुंदर लागता विषयो पण तेने
आकर्षी शकता नथी. जेने भोजन पण सारुं लागे नहि, तेने विषय भोग केम रुचे? कारण
के आध्यात्मिक आनंद आगळ विषय
भोगनो आनंद तेने तुच्छनीरस लागे छे. लोकमां
‘‘शमसुखशीलितमनसामशनपि द्वेषमेति किमु कामाः
स्थलमपि दहति झषाणां किमङ्गं पुनरङ्गमङ्गाराः’’ ।।।।
ही है, दुनियाँमें भी देखा गया है कि महान् सुखकी प्राप्ति हो जाने पर अल्प सुखके पैदा
करनेवाले कारणोंके प्रति कोई आदर या ग्राह्य-भाव नहीं रहता है
ऐसा ही अन्यत्र भी
कहा है ‘‘शमसुखशीलितमनसा०’’
‘‘जिनका मन शांति-सुखसे सम्पन्न है, ऐसे महापुरुषोंको भोजनसे भी द्वेष हो जाता
है, अर्थात् उन्हें भोजन भी अच्छा नहीं लगता फि र और विषय भोगोंकी तो क्या चलाई ?
अर्थात् जिन्हें भोजन भी अच्छा नहीं लगता, उन्हें अन्य विषय-भोग क्यों अच्छे लग सकते
हैं ? अर्थात् उन्हें अन्य विषय-भोग रुचिकर प्रतीत नहीं हो सकते
हे वत्स ! देखो, जब
मछलीके अंगोंको जमीन ही जला देनेमें समर्थ है, तब अग्निके अंगारोंका तो कहना ही
क्या ? वे तो जला ही देंगे
इसलिये विषयोंकी अरुचि ही योगीकी स्वात्म-संवित्तिको प्रकट
कर देनेवाली है ’’