Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 38.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ११७
पण ए रीत छे के अधिक सुखनुं कारण प्राप्त थतां अल्प सुखना कारणो प्रति लोकोने
अनादर (अरुचि) थाय छे.
माटे विषयोनी अरुचि ज योगीनी स्वात्मसंवित्तिने प्रगट करे छे. ३७.
ते आ प्रमाणे छेः
जेम जेम विषयो सुलभ, पण नहि रुचिमां आय,
तेम तेम आतमतत्त्वमां अनुभव वधतो जाय. ३८
अन्वयार्थ :[यथा यथा ] जेम जेम [सुलभाः अपि विषयाः ] सुलभ (सहज प्राप्त)
(इन्द्रियविषयो पण [न रोचन्ते ] रुचता नथी (गमता नथी) [तथा तथा ] तेम तेम [संवित्तौ ]
स्वात्मसंवेदनमां [उत्तमम् तत्त्वम् ] उत्तम निजात्मतत्त्व [समायाति ] आवतुं जाय छे.
टीका :अहीं पण पूर्ववत् व्याख्यान समजवुं; तथा
श्री समयसार कलश श्लोक ३४मां कह्युं छे के
अतो विषयारुचिरेव योगिनः स्वात्मसंवित्तेर्गमिका तदभावे तदभावात् प्रकृष्यमाणायां च
विषयारुचौ स्वात्मसंवित्तिः प्रकृष्यते
यथा यथा न रोचन्ते विषयाः सुलभा अपि
तथा तथा समायाति संवित्तौ तत्त्वमुत्तमम् ।।३८।।
तद्यथा
टीकाअत्रापि पूर्वबद्वयाख्यानं यथाचोक्तम्
[समयसारकलशायां ]
स्वात्म-संवित्तिके अभाव होने पर विषयोंसे अरुचि नहीं होती और विषयोंके प्रति
अरुचि बढ़ने पर स्वात्म-संवित्ति भी बढ़ जाती है ।।३७।।
जस जस विषय सुलभ्य भी, ताको नहीं सुहाय
तस तस आतम तत्त्वमें, अनुभव बढ़ता जाय ।।३८।।
उपरिलिखित भावको और भी स्पष्ट करते हुए आचार्य कहते हैं
अर्थज्यों ज्यों सहजमें भी प्राप्त होनेवाले इन्द्रिय विषय भोग रुचिकर प्रतीत नहीं
होते हैं, त्यों त्यों स्वात्म-संवेदनमें निजात्मानुभवनकी परिणति वृद्धिको प्राप्त होती रहती है