कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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पण ए रीत छे के अधिक सुखनुं कारण प्राप्त थतां अल्प सुखना कारणो प्रति लोकोने
अनादर (अरुचि) थाय छे.
माटे विषयोनी अरुचि ज योगीनी स्वात्म – संवित्तिने प्रगट करे छे. ३७.
ते आ प्रमाणे छेः —
जेम जेम विषयो सुलभ, पण नहि रुचिमां आय,
तेम तेम आतम – तत्त्वमां अनुभव वधतो जाय. ३८
अन्वयार्थ : — [यथा यथा ] जेम जेम [सुलभाः अपि विषयाः ] सुलभ (सहज प्राप्त)
(इन्द्रिय – विषयो पण [न रोचन्ते ] रुचता नथी (गमता नथी) [तथा तथा ] तेम तेम [संवित्तौ ]
स्वात्म – संवेदनमां [उत्तमम् तत्त्वम् ] उत्तम निजात्म – तत्त्व [समायाति ] आवतुं जाय छे.
टीका : — अहीं पण पूर्ववत् व्याख्यान समजवुं; तथा
श्री समयसार कलश श्लोक ३४मां कह्युं छे के —
अतो विषयारुचिरेव योगिनः स्वात्मसंवित्तेर्गमिका तदभावे तदभावात् प्रकृष्यमाणायां च
विषयारुचौ स्वात्मसंवित्तिः प्रकृष्यते ।
यथा यथा न रोचन्ते विषयाः सुलभा अपि ।
तथा तथा समायाति संवित्तौ तत्त्वमुत्तमम् ।।३८।।
तद्यथा —
टीका — अत्रापि पूर्वबद्वयाख्यानं । यथाचोक्तम् ।
[समयसारकलशायां ] —
स्वात्म-संवित्तिके अभाव होने पर विषयोंसे अरुचि नहीं होती और विषयोंके प्रति
अरुचि बढ़ने पर स्वात्म-संवित्ति भी बढ़ जाती है ।।३७।।
जस जस विषय सुलभ्य भी, ताको नहीं सुहाय ।
तस तस आतम तत्त्वमें, अनुभव बढ़ता जाय ।।३८।।
उपरिलिखित भावको और भी स्पष्ट करते हुए आचार्य कहते हैं —
अर्थ — ज्यों ज्यों सहजमें भी प्राप्त होनेवाले इन्द्रिय विषय भोग रुचिकर प्रतीत नहीं
होते हैं, त्यों त्यों स्वात्म-संवेदनमें निजात्मानुभवनकी परिणति वृद्धिको प्राप्त होती रहती है ।