Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

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११८ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
‘‘हे भव्य! तने बीजो नकामो कोलाहल करवाथी शुं लाभ छे? ए कोलाहलथी
तुं विरक्त था अने एक चैतन्यमात्र वस्तुने पोते निश्चळ लीन थई देख; एवो छ महिना
अभ्यास कर अने जो (तपास) के एम करवाथी पोताना हृदय
सरोवरमां जेनुं तेज, प्रताप,
प्रकाश पुद्गलथी भिन्न छे; एवा आत्मानी प्राप्ति नथी थती के थाय छे.’’
भावार्थ :विषयोनी रुचि न होवाथी ए आत्माना विशुद्ध स्वरूपनी प्राप्तिनुं
कारण छे. जेम जेम इन्द्रियविषयो प्रत्ये विरक्ति (उदासीनता) वधती जाय छे, तेम तेम
स्वात्मसंवेदनमांशुद्धात्माना अनुभवमां पण वृद्धि थती जाय छे.
माटे पर पदार्थो संबंधी सर्व संकल्पविकल्पोनो त्याग करी, विषयोथी मन व्यावृत्त
करी, एकान्तमां स्वात्माना अवलोकननो अभ्यास करवो, तेनाथी थोडा समयमां
शुद्धात्मस्वरूपनी प्राप्ति थाय छे. ३८.
स्वात्मसंवित्ति वधतां जे चिह्नो थाय छे ते सांभळ; जेम के
‘‘विरम किमपरेणाकार्यकोलाहलेन,
स्वयमपि निभृतः सन्पश्य षण्मासमेकं
हृदयसरसि पुंसः पुद्गलाद्भिन्नधाम्नो,
ननु किमनुपलब्धिर्भाति किंचोपलब्धिः’’
।।
प्रकृष्यमाणायां च स्वात्मसंवित्तौ यानि चिह्नानि स्युस्तान्याकर्णय यथा
विशदार्थविषय भोगोंके प्रति अरुचि भाव ज्यों ज्यों वृद्धिको प्राप्त होते हैं, त्यों
त्यों योगीके स्वात्म-संवेदनमें निजात्मानुभवनकी परिणति वृद्धिको प्राप्त होती रहती है कहा
भी है ‘‘विरम किमपरेणा’’
आचार्य शिष्यको उपदेश देते हैं, हे वत्स ! ठहर, व्यर्थके ही अन्य कोलाहलोंसे
क्या लाभ ? निश्चिन्त हो छह मास तक एकान्तमें, अपने आपका अवलोकन तो कर देख,
हृदयरूपी सरोवरमें पुद्गलसे भिन्न तेजवाली आत्माकी उपलब्धि (प्राप्ति) होती है, या
अनुपलब्धि (अप्राप्ति)
।।३८।।
हे वत्स !स्वात्मसंवित्तिके बढ़ने पर क्या क्या बातें होती हैं, किस रूप परिणति
होने लगती है, आदि बातोंको सुन