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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
‘‘हे भव्य! तने बीजो नकामो कोलाहल करवाथी शुं लाभ छे? ए कोलाहलथी
तुं विरक्त था अने एक चैतन्यमात्र वस्तुने पोते निश्चळ लीन थई देख; एवो छ महिना
अभ्यास कर अने जो (तपास) के एम करवाथी पोताना हृदय – सरोवरमां जेनुं तेज, प्रताप,
प्रकाश पुद्गलथी भिन्न छे; एवा आत्मानी प्राप्ति नथी थती के थाय छे.’’
भावार्थ : — विषयोनी रुचि न होवाथी ए आत्माना विशुद्ध स्वरूपनी प्राप्तिनुं
कारण छे. जेम जेम इन्द्रिय – विषयो प्रत्ये विरक्ति (उदासीनता) वधती जाय छे, तेम तेम
स्वात्म – संवेदनमां — शुद्धात्माना अनुभवमां पण वृद्धि थती जाय छे.
माटे पर पदार्थो संबंधी सर्व संकल्प – विकल्पोनो त्याग करी, विषयोथी मन व्यावृत्त
करी, एकान्तमां स्वात्माना अवलोकननो अभ्यास करवो, तेनाथी थोडा समयमां
शुद्धात्मस्वरूपनी प्राप्ति थाय छे. ३८.
स्वात्मसंवित्ति वधतां जे चिह्नो थाय छे ते सांभळ; जेम के —
‘‘विरम किमपरेणाकार्यकोलाहलेन,
स्वयमपि निभृतः सन्पश्य षण्मासमेकं ।
हृदयसरसि पुंसः पुद्गलाद्भिन्नधाम्नो,
ननु किमनुपलब्धिर्भाति किंचोपलब्धिः’’ ।।
प्रकृष्यमाणायां च स्वात्मसंवित्तौ यानि चिह्नानि स्युस्तान्याकर्णय । यथा —
विशदार्थ — विषय भोगोंके प्रति अरुचि भाव ज्यों ज्यों वृद्धिको प्राप्त होते हैं, त्यों
त्यों योगीके स्वात्म-संवेदनमें निजात्मानुभवनकी परिणति वृद्धिको प्राप्त होती रहती है । कहा
भी है — ‘‘विरम किमपरेणा०’’
आचार्य शिष्यको उपदेश देते हैं, हे वत्स ! ठहर, व्यर्थके ही अन्य कोलाहलोंसे
क्या लाभ ? निश्चिन्त हो छह मास तक एकान्तमें, अपने आपका अवलोकन तो कर । देख,
हृदयरूपी सरोवरमें पुद्गलसे भिन्न तेजवाली आत्माकी उपलब्धि (प्राप्ति) होती है, या
अनुपलब्धि (अप्राप्ति) ।।३८।।
हे वत्स ! – स्वात्मसंवित्तिके बढ़ने पर क्या क्या बातें होती हैं, किस रूप परिणति
होने लगती है, आदि बातोंको सुन —