Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 39.

< Previous Page   Next Page >


Page 119 of 146
PDF/HTML Page 133 of 160

 

background image
कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ ११९
इन्द्रजाल सम देख जग, आतमहित चित्त लाय,
अन्यत्र चित्त जाय जो, मनमां ते पस्ताय. ३९.
अन्वयार्थ :योगी [निःशेष जगत् ] समस्त जगतने [इन्द्रजालोपम् ] इन्द्रजाल
समान [निशामयति ] समजे छे (देखे छे), [आत्मलाभाय ] आत्मस्वरूपनी प्राप्ति माटे
[स्पृहयति ] स्पृहा (अभिलाषा) करे छे अने [अन्यत्र गत्वा अनुतप्यते ] अन्यत्र (अन्य
विषयमां) लागी जाय, तो ते पश्चात्ताप करे छे.
टीका :‘योगी’ शब्द अन्त दीपक होवाथी बधे योजवो. (अर्थात् निशामयति,
स्पृहयति आदि क्रियापदो साथे तेने कर्ता तरीके योजवो.)
स्वात्म संवेदनमां जेने रस छे तेवो ध्याता (योगी) चर (जंगम), अचर (स्थावर)
रूप बाह्य वस्तु समूहने, इन्द्रिजालिक द्वारा बतावेला सर्प, हारादि पदार्थसमूह समान
देखे छे, कारण के अवश्य उपेक्षणीयपणाने लीधे (ते वस्तुओ) त्यागग्रहण (विषयक)
बुद्धिनो विषय छे; तथा ते आत्मलाभ माटे स्पृहा (इच्छा) करे छे. अर्थात् चिदानंदस्वरूप
आत्मानो अनुभव करवा इच्छे छे; तथा अन्यत्र अर्थात् स्वात्माने छोडी अन्य कोई पण
निशामयति निःशेषमिन्द्रजालोपं जगत्
स्पृहयत्यात्मलाभाय गत्वान्यत्रानुतप्यते ।।३९।।
टीकायोगीत्यन्तदीपकत्वात्सर्वत्र योज्यः स्वात्मसंवित्तिरसिको ध्याता चरांचरं
बहिर्वस्तुजातमवश्योपेक्षणीयतया हानोपादानबुद्धिविषयत्वादिन्द्रजालिकोपदर्शितसर्पहारादिपदार्थसदृशं
पश्यति
तथात्मलाभाय स्पृहयति चिदानन्दस्वरूपमात्मानं संवेदयितुमिच्छति तथा अन्यत्र स्वात्म-
इन्द्रजाल सम देख जग, निज अनुभव रुचि लात
अन्य विषय में जात यदि, तो मनमें पछतात ।।३९।।
अर्थयोगी समस्त संसारको इन्द्रजालके समान समझता है आत्मस्वरूपकी
प्राप्तिके लिये अभिलाषा करता है तथा यदि किसी अन्य विषयमें उलझ जाता, या लग
जाता है तो पश्चात्ताप करता है
विशदार्थश्लोक नं. ४२में कहे गये ‘‘योगी योगपरायणः’’ शब्दको अन्त्यदीपक
होनेसे सभी ‘‘निशामयति स्पृहयति’’ आदि क्रियापदोंके साथ लगाना चाहिए स्वात्म-संवेदन
करनेमें जिसे आनन्द आया करता है, ऐसा योगी इस चर, अचर, स्थावर, जंगमरूप समस्त