१२० ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
वस्तुमां, पूर्वना संस्कारादिवश मन – वचन – कायथी प्रवृत्ति करे तो त्यांथी हठी (पाछा वळी)
स्वयं ज पश्चात्ताप करे छे, के ‘अरे! माराथी अनात्मीन (आत्माने अहितरूप) अनुष्ठान
केम थयुं?’’ एवो पश्चात्ताप करे छे.
भावार्थ : — जेने स्वात्म – संवेदनमां रस छे – आनंद आवे छे तेने जगतना स्थावर
अने जंगमरूप समस्त बाह्य पदार्थो तथा इन्द्रिय – विषयो इन्द्रजाल समान निःसार तथा
विनश्वर प्रतीत थाय छे. तेने हवे सांसारिक विषय – भोगनी इच्छा थती नथी, परंतु
आत्मस्वरूपनी ज प्राप्ति माटे प्रबल भावना रह्या करे छे.
आत्मस्वरूपने छोडी अन्य पदार्थो तरफ तेनी वृत्ति जती नथी, अने कदाच पूर्वना
संस्कारवश तथा पोतानी अस्थिरताने लीधे ते प्रति मन – वचन काय द्वारा प्रवृत्त थई जाय,
तो त्यांथी तुरत पाछो हठी अफसोस करे छे के, ‘‘अरे! मारा स्वरूपथी च्युत थई, हुं
आत्मानुं अहित करी बेठो!’’ एम ते पश्चात्ताप करे छे अने आत्म – निन्दा – गर्हादि करी
पोतानी शुद्धि करे छे.
ज्ञानी जगतना पदार्थोने ज्ञेय समजी आत्मस्वरूपमां लीन रहे छे — ते वात दर्शावतां
आचार्य श्री अमितगतिए ‘सुभाषित रत्नसंदोह’ श्लोक ३३५मां कह्युं छे के —
‘‘आ लक्ष्मी थोडा ज दिवस सुखदायक प्रतीत थाय छे. तरुण स्त्रीओ जुवानीमां ज
मनने अतुल आनंद आपे छे, विषय – भोगो विजळी समान चंचळ छे अने शरीर
व्याधिओथी ग्रसित रहे छे. एम विचारी गुणवान ज्ञानी पुरुषो आत्मस्वरूपमां ज रत
(लीन) रहे छे.’’*
व्यतिरिक्ते यत्र क्वापि वस्तुनि पूर्वसंस्कारादिवशात्मनोवाक्कायैर्गत्वा व्यावृत्य अनुतप्यते स्वयमेव,
आ कथं मयेदमनात्मीनमनुष्ठितमिति पश्चात्तापं करोति ।
बाहिरी वस्तु-समूहको त्याग और गृहण विषयक बुद्धिका अविषय होनेसे अवश्य उपेक्षणीय
रूप इन्द्रियजालियाके द्वारा दिखलाये हुए सर्प-हार आदि पदार्थोंके समूहके समान देखता
है । तथा चिदानन्द – स्वरूप आत्माके अनुभवकी इच्छा करता है । और अपनी आत्माको
छोड़कर अन्य किसी भी वस्तुमें पहिले संस्कार आदि कारणोंसे यदि मनसे, वचनसे, वा
कायासे, प्रवृत्ति कर बैठता है, तो वहाँसे हटकर खुद ही पश्चात्ताप करता है, कि ओह !
यह मैंने कैसा आत्माका अहित कर डाला ।।३९।।
* भवत्येषा लक्ष्मीः कतिपयदिनान्येव सुखदा तरुणयस्तारुण्ये विदघति मनःप्रीतिमतुलां ।
तडिल्लोलाभोगा वपुरविचलं व्याधि – कलितं, बुधाः संचिन्त्येति प्रगुणमनसो ब्रह्मणि रताः ।।३३५।।
(सुभाषितरत्नसंदोहः – श्री अमितगतिराचार्यः)