Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration). Shlok: 40.

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कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १२१
तथा
चाहे गुप्त निवासने, निर्जन वनमां जाय,
कार्यवश जो कंई कहे, तुर्त ज भूली जाय. ४०.
अन्वयार्थ :[निर्जनं जनितादरः ] निर्जनता माटे जेने आदर उत्पन्न थयो छे, तेवो
योगी [एकान्तसंवासं इच्छति ] एकान्तवासने इच्छे छे अने [निजकार्यवशात् ] निज कार्यवश
[किंचित् उक्त्वा ] कंईक बोली गयो होय, तो ते [द्रुतं ] जलदी [विस्मरति ] भूली जाय छे.
टीका :एकान्तमां स्वभावथी निर्जन एवा पर्वत, वनादिमां संवासअर्थात् गुरु
आदि साथे रहेवानी अभिलाषा करे छे. केवो थईने? जेने (निर्जन स्थान माटे आदर
उत्पन्न थयो छे) तथा लोकोनुं मनोरंजन करनार चमत्कारी मंत्र
आदिना प्रयोगनी वातोनी
निवृत्ति अर्थे (प्रयोगनी वातो बंध करवा माटे) जेणे प्रयत्न कर्यो छे, तेवो तेकोने माटे
(आदर) छे? निर्जन स्थान माटे अर्थात् लोकना अभाव माटेस्वार्थवश लाभ
तथा
इच्छत्येकान्तसंवासं निर्जनं जनितादरः
निजकार्यवशात्किंचिदुक्त्वा विस्मरति द्रुतं ।।४०।।
टीकाएकान्ते स्वभावतो निर्जने गिरिगहनादौ संवासं गुर्वादिभिः
सहावस्थानमभिलषति किं विशिष्टः सन् ? जनितादरो जनमनोरञ्जनचमत्कारिमन्त्रादिप्रयोग-
वार्त्तानिर्वृत्तौ कृतप्रयत्नः कस्मै ? निर्जनं जनाभावाय स्वार्थवशाल्लाभालाभादिप्रश्नार्थं
आत्मानुभवीके और भी चिन्होंको दिखाते हैं
निर्जनता आदर करत, एकांत सुवास विचार
निज कारजवश कुछ कहे, भूल जात उस बार ।।४०।।
अर्थनिर्जनताको चाहनेवाला योगी एकान्तवासकी इच्छा करता है, और निज
कार्यके वशसे कुछ कहे भी तो उसे जल्दी भुला देता है
विशदार्थलोगोंके मनोरंजन करनेवाले चमत्कारी मन्त्रतन्त्र आदिके प्रयोग
करनेकी वार्ताएँ न कि या करें, इसके लिये अर्थात् अपने मतलबसे लाभ-अलाभ आदिकके
प्रश्न पूछनेके लिए आनेवाले लोगोंको मना करनेके लिए किया है प्रयत्न जिसने ऐसा योगी