कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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तथा —
चाहे गुप्त निवासने, निर्जन वनमां जाय,
कार्यवश जो कंई कहे, तुर्त ज भूली जाय. ४०.
अन्वयार्थ : — [निर्जनं जनितादरः ] निर्जनता माटे जेने आदर उत्पन्न थयो छे, तेवो
योगी [एकान्तसंवासं इच्छति ] एकान्तवासने इच्छे छे अने [निजकार्यवशात् ] निज कार्यवश
[किंचित् उक्त्वा ] कंईक बोली गयो होय, तो ते [द्रुतं ] जलदी [विस्मरति ] भूली जाय छे.
टीका : — एकान्तमां स्वभावथी निर्जन एवा पर्वत, वनादिमां संवास – अर्थात् गुरु
आदि साथे रहेवानी अभिलाषा करे छे. केवो थईने? जेने (निर्जन स्थान माटे आदर
उत्पन्न थयो छे) तथा लोकोनुं मनोरंजन करनार चमत्कारी मंत्र – आदिना प्रयोगनी वातोनी
निवृत्ति अर्थे ( – प्रयोगनी वातो बंध करवा माटे) जेणे प्रयत्न कर्यो छे, तेवो ते – कोने माटे
(आदर) छे? निर्जन स्थान माटे अर्थात् लोकना अभाव माटे – स्वार्थवश लाभ –
तथा —
इच्छत्येकान्तसंवासं निर्जनं जनितादरः ।
निजकार्यवशात्किंचिदुक्त्वा विस्मरति द्रुतं ।।४०।।
टीका — एकान्ते स्वभावतो निर्जने गिरिगहनादौ संवासं गुर्वादिभिः
सहावस्थानमभिलषति । किं विशिष्टः सन् ? जनितादरो जनमनोरञ्जनचमत्कारिमन्त्रादिप्रयोग-
वार्त्तानिर्वृत्तौ कृतप्रयत्नः । कस्मै ? निर्जनं जनाभावाय स्वार्थवशाल्लाभालाभादिप्रश्नार्थं
आत्मानुभवीके और भी चिन्होंको दिखाते हैं —
निर्जनता आदर करत, एकांत सुवास विचार ।
निज कारजवश कुछ कहे, भूल जात उस बार ।।४०।।
अर्थ — निर्जनताको चाहनेवाला योगी एकान्तवासकी इच्छा करता है, और निज
कार्यके वशसे कुछ कहे भी तो उसे जल्दी भुला देता है ।
विशदार्थ — लोगोंके मनोरंजन करनेवाले चमत्कारी मन्त्र – तन्त्र आदिके प्रयोग
करनेकी वार्ताएँ न कि या करें, इसके लिये अर्थात् अपने मतलबसे लाभ-अलाभ आदिकके
प्रश्न पूछनेके लिए आनेवाले लोगोंको मना करनेके लिए किया है प्रयत्न जिसने ऐसा योगी