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इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
अलाभादिना प्रश्नो पूछवा माटे पासे आवता लोकोने निषेध करवा माटे (मनाई करवा
माटे तेने निर्जन स्थान माटे आदर छे) – एवो अर्थ छे.
ध्यानथी ज लोक चमत्कारी अतिशयो थाय छे; तथा
‘तत्त्वानुशासन’ – श्लोक ८७मां कह्युं छेः —
‘गुरुनो उपदेश प्राप्त करी निरंतर अभ्यास करनार धारणाना सौष्ठवथी (पोतानी
सम्यक् अने सुद्रढ अवधारण शक्तिना बळथी), ध्यानना प्रत्ययो (लोक चमत्कारी अतिशयो)
देखे छे.’
तथा पोताने अवश्य करवा योग्य भोजनादिनी परतंत्रताना कारणे कंईक – थोडुंक
श्रावकादिने कहे छे, ‘‘अहो! अहो आ. अहो ए करो,’’ इत्यादि कहीने ते क्षणे ज ते
भूली जाय छे. ‘भगवन्! शो हुकम छे?’ एम श्रावकादि पूछे छे, छतां ते कंई उत्तर
आपता नथी.
लोकमुपसर्यन्तं निषेधुमित्यर्थः । ध्यानाद्धि लोकचमत्कारिणः प्रत्ययाः स्युः ।
तथाचोक्तम्, [तत्त्वानुशासने ] —
‘‘गुरूपदेशामासाद्य समभ्यस्यन्ननारतम् ।
घारणासौष्ठवाध्यानप्रत्ययानपि पश्यति’’ ।।८७।।
तथा स्वस्वावश्यकरणीयभोजनादिपारतन्त्र्यात्किंचिदल्पमसमग्रं श्रावकादिकं प्रति अहो इति
अहो इदं कुर्वनित्यादि भाषित्वा तत्क्षण एव विस्मरति । भगवन् ! किमादिश्यत इति श्रावकादौ
पृच्छति सति न किमप्युत्तरं ददाति ।
स्वभावसे ही जनशून्य ऐसे पहाड़ोंकी गुफा – कन्दरा आदिकोंमें गुरुओंके साथ रहना चाहता
है । ध्यान करनेसे लोक-चमत्कार बहुतसे विश्वास व अतिशय हो जाया करते हैं, जैसा
कि कहा गया है — ‘‘गुरूपदेशमासाद्य०’’
‘‘गुरुसे उपदेश पाकर हमेशा अच्छी तरह अभ्यास करते रहनेवाला, धारणाओंमें
श्रेष्ठता प्राप्त हो जानेसे ध्यानके अतिशयोंको भी देखने लग जाता है ।’’ अपने शरीरके लिये
अवश्य करने योग्य जो भोजनादिक, उसके वशसे कुछ थोड़ासा श्रावकादिकोंसे ‘‘अहो,
देखो, इस प्रकार ऐसा करना, अहो, और ऐसा, यह इत्यादि’’ कहकर उसी क्षण भूल
जाता है । भगवन् ! क्या कह रहे हो ? ऐसा श्रावकादिकोंके द्वारा पूछे जाने पर योगी कुछ
भी जवाब नहीं देता । तथा — ।।४०।।