कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
[ १२३
भावार्थ : — स्व – परना भेदविज्ञानना अभ्यासना बळे ज आत्माने स्वात्मानुभवनुं
वेदन थाय छे, त्यारे ते लोकोने रंजन करे तेवा मंत्र – तंत्रना प्रयोगनी वातोथी दूर रहेवा
माटे तथा लोको पोताना स्वार्थनी खातर लाभालाभना प्रश्नो पूछी तेने आत्मध्यानमां खलेल
न करे, ते माटे ते आदरपूर्वक निर्जन स्थानमां रहेवा इच्छे छे.
भोजनादिनी परतंत्रताने लीधे तेने निर्जन स्थान छोडी आहारार्थे श्रावकोनी वस्तीमां
जवुं पडे, तो कार्यवशात् अल्प वचनालाप पण करे छे, परंतु आहार लई पोताना स्थाने
आवी ज्यारे ते स्वरूप – चिन्तनमां लीन थई जाय छे, त्यारे ते वचनालाप संबंधी सर्व भूली
जाय छे. कोई पूछे तोपण ते कांई उत्तर आपता नथी.
तथा —
देखे पण नहीं देखता, बोले छतां अबोल,
चाले छतां न चालता, तत्त्वस्थित अडोल. ४१
अन्वयार्थ : — [स्थिरीकृतात्मतत्त्वस्तु ] जेणे आत्मतत्त्वना विषयमां स्थिरता प्राप्त
करी छे ते [ तु ब्रवन् अपि न ब्रुते ] बोलतो होवा छतां बोलतो नथी, [गच्छन् अपि न गच्छति ]
चालतो होवा छतां चालतो नथी अने [पश्यन् अपि न पश्यति ] देखतो होवा छतां देखतो
नथी.
टीका : — जेणे आत्मतत्त्वना विषयमां स्थिरता प्राप्त करी – अर्थात् जेणे
आत्मस्वरूपने द्रढ प्रतीतिनो विषय बनाव्यो छे, तेवो योगी संस्कारवश या बीजाना
तथा —
ब्रुवन्नपि हि न ब्रूते गच्छन्नपि न गच्छति ।
स्थिरीकृतात्मतत्त्वस्तु पश्यन्नपि न पश्यति ।।४१।।
टीका — स्थिरीकृतात्मतत्त्वो दृढप्रतीतिगोचरीकृतस्वस्वरूपो योगी संस्कारवशात्परोपरोधेन
देखत भी नहिं देखते, बोलत बोलत नाहिं ।
दृढ़ प्रतीत आतममयी, चालत चालत नाहिं ।।४१।।
अर्थ — जिसने आत्म-स्वरूपके विषयमें स्थिरता प्राप्त कर ली है, ऐसा योगी बोलते
हुए भी नहीं बोलता, चलते हुए भी नहीं चलता, और देखते हुए भी नहीं देखता है ।
विशदार्थ — जिसने अपनेको दृढ़ प्रतीतिका विषय बना लिया है, ऐसा योगी