Ishtopdesh-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 124 of 146
PDF/HTML Page 138 of 160

 

background image
१२४ ]
इष्टोपदेश
[ भगवानश्रीकुंदकुंद-
उपरोधथी (अनुरोधथी) बोलतो होवा छतां अर्थात् धर्मादिकनुं व्याख्यान करतो होवा छतां
न ते योग सहित छे (योगमां स्थित छे
एवो अपि शब्दनो अर्थ छे). पण ते बोलतो
ज नथीभाषण करतो ज नथी. कारण के तेने (योगीने) बोलवा तरफ अभिमुखपणानो
अभाव छे.
‘समाधितन्त्र’श्लोक ५०मां कह्युं छे केः
(अन्तरात्मा) आत्मज्ञानथी भिन्न अन्य कार्यने पोतानी बुद्धिमां चिरकाल तक
(लांबा समय सुधी) धारण करे नहि. जो प्रयोजनवशात् ते वचनकायथी कंई पण करवानो
विकल्प करे तो ते अतत्पर थई करे.’’
तथा (योगी) भोजन माटे जतो होवा छतां जतो नथी अने सिद्ध प्रतिमादिकने
देखतो होवा छतां देखतो ज नथी, ए ज एनो अर्थ छे.
भावार्थ :जे योगीए आत्मस्वरूपने पोतानी द्रढ प्रतीतिनो विषय बनाव्यो छे
अर्थात् आत्मस्वरूपना विषयमां स्थिरता प्राप्त करी छे, तेने संस्कारवश या बीजाना
ब्रुवन्नपि धर्मादिकं भाषमाणोऽपि (न केवलं योगेन तिष्ठति ह्यपि शब्दार्थः) न ब्रूते हि न
भाषत एव तत्राभिमुख्याभावात्
उक्तं च [समाधितंत्रे ]
‘‘आत्मज्ञानात्परं कार्यं न बुद्धौ धारयेच्चिरम्
कुर्यादर्थवशात्किञ्चिद्वाक्कायाभ्यामतत्परः’’ ।।५०।।
तथा भोजनार्थं व्रजन्नपि न व्रजत्यपि तथा सिद्धप्रतिमादिकमवलोकयन्नपि
नावलोकयत्येवतुरेवार्थः
संस्कारोंके वशसे या दूसरोंके संकोचसे धर्मादिकका व्याख्यान करते हुए भी नहीं बोल रहा
है, ऐसा समझना चाहिए, क्योंकि उनको बोलनेकी ओर झुकाव या ख्याल नहीं होता
जैसा
कि कहा है‘‘आत्मज्ञानात्परं कार्यं’’
‘‘आत्म-ज्ञानके सिवा दूसरे कार्यको अपने प्रयोगमें चिरकाल-तक ज्यादा-देर तक
न ठहरने देवे किसी प्रयोजनके वश यदि कुछ करना पड़े, तो उसे अतत्पर होकर-
अनासक्त होकर वाणी व शरीरके द्वारा करे इसी प्रकार भोजनके लिए जाते हुए भी
नहीं जा रहा है, तथा सिद्ध प्रतिमादिकोंको देखते हुए भी नहीं देख रहा है, यही समझना
चाहिए
फि र।।४१।।