कहान जैनशास्त्रमाळा ]
इष्टोपदेश
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अनुरोधथी कांई बोलवुं पडे या धार्मिक उपदेश देवो पडे, छतां ते कार्यमां तेनी बुद्धिपूर्वक
प्रवृत्ति नहि होवाथी ते उपदेश देतो होवा छतां ते उपदेश देतो नथी.
ज्ञानीने कार्यवशात् कोई कार्यमां प्रवृत्ति करवी पडे तो कार्यसमये पण ते पोताना
ज्ञानस्वरूपी आत्माने चूकतो नहि होवाथी, तेने ते कार्य प्रति बुद्धिपूर्वक झुकाव
(अभिमुखपणुं) — होतुं नथी, तेथी ते बाह्य कार्य करतो जणातो होवा छतां, वास्तवमां ते
कार्य करतो नथी. ज्ञानीनी बधी क्रियाओ रागना स्वामित्व रहित होय छे, तेथी तेनी बधी
बाह्य क्रियाओ नहि कर्या समान छे. ४१. तथा —
कोनुं, केवुं, क्यां, कहीं, आदि विकल्प विहीन,
जाणे नहि निज देहने, योगी आतम – लीन. ४२.
अन्वयार्थ : — [योगपरायणः ] योगपरायण (ध्यानमां लीन) [योगी ] योगी, [किम्
इदं ] आ शुं छे? [कीदृशं ] केवुं छे? [कस्य ] कोनुं छे? [कस्मात् ] शाथी छे? [क्व ] क्यां
छे? [इति अविशेषयन् ] इत्यादि भेदरूप विकल्पो नहि करतो थको [स्वदेहम् अपि ] पोताना
शरीरने पण [न अवैति ] जाणतो नथी ( – तेने पोताना शरीरनो पण ख्याल रहेतो नथी).
टीका : — आ अनुभवमां आवतुं आध्यात्मिक तत्त्व (अन्तसत्त्व) शुं छे? केवा
स्वरूपवाळुं छे? केवुं छे? कोना जेवुं छे? तेनो स्वामी कोण छे? कोनाथी छे? क्यां छे?
तथा —
किमिदं कीदृशं कस्य कस्मात्क्वेत्यविशेषयन् ।
स्वदेहमपि नावैति योगी योगपरायणः ।।४२।।
टीका — इदमध्यात्ममनुभूयमानं तत्त्वं किं किंरूपं कीदृशं केन सदृशं कस्य स्वामिकं
कस्मात्कस्य सकाशात्क्व कस्मिन्नस्तीत्यविशेषयन् अविकल्पयन्सन् योगपरायणः समरसीभावमापन्नो
क्या कैसा किसका किसमें, कहाँ यह आतम राम ।
तज विकल्प निज देह न जाने, योगी निज विश्राम ।।४२।।
अर्थ — ध्यानमें लगा हुआ योगी यह क्या है ? कैसा है ? किसका है ? क्यों है ?
कहाँ है ? इत्यादिक विकल्पोंको न करते हुए अपने शरीरको भी नहीं जानता ।
विशदार्थ — यह अनुभवमें आ रहा अन्तस्तत्त्व, किस स्वरूपवाला है ? किसके
सदृश है ? इसका स्वामी कौन है ? किससे होता है ? कहाँ पर रहता है ? इत्यादिक